मुख्य बिंदु
इस लेख में
एकादशी श्राद्ध, जिसे ग्यारस श्राद्ध भी कहते हैं, वह श्राद्ध अनुष्ठान है जो उन पूर्वजों के लिए किया जाता है जिनका निधन शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि — ग्यारहवें चंद्र दिवस — पर हुआ था। वर्ष 2026 में एकादशी श्राद्ध मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को पड़ता है, जो पितृ पक्ष के पवित्र पंद्रह दिनों के भीतर है। जिन परिवारों के प्रियजन एकादशी को दिवंगत हुए, उनके लिए यह दिन एक विशेष दायित्व और पितर-आत्माओं को उच्च लोकों की ओर मुक्त करने का गहन आध्यात्मिक अवसर है। सही तिथि पर श्राद्ध करने से यह मान्यता है कि भोजन, जल और प्रार्थनाओं का अर्पण सीधे दिवंगत आत्मा तक पहुँचता है, जिससे पितर और जीवित परिवार दोनों को शांति मिलती है।
एकादशी श्राद्ध क्या है?
हिन्दू परम्परा में प्रत्येक व्यक्ति का श्राद्ध आदर्शतः उस चंद्र तिथि पर किया जाता है जो उनकी मृत्यु के दिन से मेल खाती हो। एकादशी तिथि का अपना गहन आध्यात्मिक महत्त्व है — यह भगवान विष्णु का दिन है, जो उपवास, पूजा और मोक्ष के लिए शुभ माना जाता है। जब किसी पूर्वज का निधन इस तिथि को हो, तो पितृ पक्ष के भीतर आने वाली एकादशी पर उनका श्राद्ध करने से जीवितों और दिवंगत के बीच सबसे प्रत्यक्ष आत्मिक संपर्क स्थापित होता है — ऐसी पारम्परिक मान्यता है।
एकादशी शब्द संस्कृत से आया है जिसका अर्थ है “ग्यारह” (एक = एक, दशी = दस)। यह चंद्र पखवाड़े के ग्यारहवें दिन को कहते हैं। चूँकि हिन्दू चंद्र पंचांग में प्रत्येक माह दो पखवाड़े होते हैं — उजला आधा (शुक्ल पक्ष) और अँधेरा आधा (कृष्ण पक्ष) — एकादशी प्रत्येक माह दो बार आती है। पितृ पक्ष की एकादशी श्राद्ध उन सभी पूर्वजों के लिए है जिनका निधन वर्ष के किसी भी माह में शुक्ल एकादशी या कृष्ण एकादशी को हुआ हो।
एकादशी श्राद्ध को उत्तर भारत के हिन्दी-भाषी क्षेत्र में ग्यारस श्राद्ध भी कहते हैं, जहाँ “ग्यारस” क्षेत्रीय बोली में “ग्यारह” का देशज रूप है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के परिवारों में यह नाम प्रचलित है। क्षेत्रीय नाम जो भी हो, अनुष्ठान का महत्त्व और शास्त्रीय आधार सभी परम्पराओं में एक-समान रहता है।
एकादशी श्राद्ध 2026 — तिथि एवं मुहूर्त
वर्ष 2026 में पितृ पक्ष शनिवार, 26 सितम्बर से प्रारम्भ होकर शनिवार, 10 अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या के साथ समाप्त होता है। इस पवित्र पखवाड़े में एकादशी श्राद्ध मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को पड़ता है।
श्राद्ध अनुष्ठान के लिए सर्वाधिक शुभ समय कुतप मुहूर्त और रोहिण मुहूर्त है, जो देर सुबह से दोपहर तक होता है और अपराह्न काल (दोपहर लगभग 12 बजे से 3 बजे तक सौर-गणना से) तक चलता है। मुहूर्त परम्परा के अनुसार पितृ पक्ष श्राद्ध अपराह्न काल में ही करना चाहिए, तभी अर्पण पितरों तक सबसे प्रभावशाली ढंग से पहुँचता है। 6 अक्टूबर 2026 के कुतप एवं रोहिण मुहूर्त के सटीक समय के लिए श्रद्धालु DrikPanchang पितृपक्ष कैलेंडर देख सकते हैं।
मुख्य श्राद्ध अनुष्ठान के पश्चात् तर्पण किया जाता है — तिल, जौ और कुशा घास मिलाए गए जल से पितरों को अर्पण। तर्पण दिवंगत आत्माओं की आत्मिक तृष्णा शांत करने का प्रत्यक्ष कार्य है और आदर्शतः किसी पवित्र नदी-संगम पर किया जाना चाहिए। प्रयागराज का त्रिवेणी संगम — जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती मिलती हैं — तर्पण के लिए भारत के सबसे शक्तिशाली स्थलों में माना जाता है।
एकादशी तिथि पर श्राद्ध कौन करे?
एकादशी श्राद्ध विशेष रूप से उन परिवार के सदस्यों के लिए किया जाता है जिनकी तिथिवार — अर्थात् जिस तिथि को उनका निधन हुआ — शुक्ल एकादशी या कृष्ण एकादशी थी। व्यावहारिक दृष्टि से, यदि आपके दादा, दादी, माता-पिता, भाई-बहन अथवा कोई पितृ-पक्ष या मातृ-पक्ष के पूर्वज किसी भी चंद्र माह के ग्यारहवें दिन दिवंगत हुए हों, तो पितृ पक्ष में उनका श्राद्ध एकादशी श्राद्ध के दिन ही करना चाहिए।
श्राद्ध करने का शास्त्रीय दायित्व मुख्यतः दिवंगत के ज्येष्ठ पुत्र पर होता है, जो गृह्य-सूत्र परम्परा के अनुसार है। पुत्र के अभाव में, नीचे दिए गए व्यक्ति प्राथमिकता के क्रम में श्राद्ध करने के अधिकारी हैं: पौत्र (पुत्र का पुत्र), प्रपौत्र, दिवंगत की पत्नी, भाई, भतीजा, भाँजा, पुत्री, दौहित्र (पुत्री का पुत्र), शिष्य, और कुछ परम्पराओं में घनिष्ठ मित्र। आधुनिक धर्मशास्त्रीय व्याख्याओं में पुत्री और उनके पुत्र को भी पूर्ण रूप से योग्य निष्पादकर्ता माना गया है, विशेषतः उन परिवारों में जहाँ कोई पुरुष उत्तराधिकारी न हो।
यदि आप अपने पूर्वज के निधन की सटीक तिथि नहीं जानते, या कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है, तो उनका श्राद्ध सर्व पितृ अमावस्या (10 अक्टूबर 2026) पर करें, जो मृत्यु-तिथि की परवाह किए बिना सभी पूर्वजों के लिए सार्वभौमिक दिन है। अमावस्या श्राद्ध यह सुनिश्चित करता है कि पितृ पक्ष में कोई भी आत्मा अर्पण से वंचित न रहे।
एकादशी श्राद्ध की विधि एवं प्रक्रिया
एकादशी श्राद्ध के अनुष्ठान, समस्त पितृ पक्ष श्राद्धों की तरह, वैदिक परम्परा में निहित एक सुव्यवस्थित क्रम का पालन करते हैं। पिंड दान (चावल या जौ के पिंड-अर्पण) और तर्पण दो केंद्रीय कार्य हैं, जो कई प्रारम्भिक और समापन विधियों द्वारा पूर्ण होते हैं।
तैयारी (पूर्व-रात्रि एवं प्रातःकाल): कर्ता को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, भूमि पर या साधारण बिछावन पर शयन करना चाहिए, और प्याज, लहसुन, माँस, मछली तथा नशे की वस्तुओं से बचना चाहिए। एकादशी श्राद्ध के दिन प्रातः पवित्र नदी में या घर पर शुद्ध जल से स्नान करने के पश्चात् कर्ता को ताज़े श्वेत या हल्के रंग के वस्त्र पहनने चाहिए और श्वेत चंदन का तिलक लगाना चाहिए।
संकल्प (सङ्कल्प): अनुष्ठान का आरम्भ संकल्प से होता है — एक औपचारिक घोषणा जिसमें कर्ता अपना नाम, वंश (गोत्र), सम्मानित किए जाने वाले पूर्वजों के नाम और श्राद्ध का विशेष उद्देश्य बताता है। यह संकल्प अंजलि में जल, तिल और पुष्प लेकर किया जाता है।
पिंड दान (पिण्ड दान): चावल या जौ का आटा पका कर पिंड बनाए जाते हैं और उनमें तिल, शहद और घी मिलाया जाता है। ये पिंड पितरों को उनका नाम लेते हुए मंत्रोच्चार के साथ अर्पित किए जाते हैं। पारम्परिक रूप से पितृ-पक्ष के तीन पीढ़ियों और मातृ-पक्ष के तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का स्मरण किया जाता है।
तर्पण (तर्पण): काले तिल, कुशा घास और जौ मिले हुए जल से पितरों का नाम लेकर अर्पण किया जाता है। प्रत्येक पूर्वज के लिए यह अर्पण तीन बार किया जाता है, आदर्शतः जल-तट पर। त्रिवेणी संगम पर यह कार्य तीन पवित्र नदियों के मिलन के कारण असाधारण आत्मिक पुण्य का फल देता है।
ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा: ब्राह्मणों को प्रेम और श्रद्धा से बने भोजन पर आमंत्रित करना पितरों को स्वयं भोजन कराने के समतुल्य माना जाता है। भोजन के अंत में ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है। भोजन सात्विक होना चाहिए — प्याज, लहसुन या माँसाहार से रहित।
काक बलि (कौवे को भोजन): हिन्दू परम्परा में कौवे पितरों के दूत माने जाते हैं। भोजन से पहले पके हुए भोजन का एक अंश पत्ते या पत्थर पर रखा जाता है जिसे कौवे खाएँ। यदि कौवा भोजन ग्रहण कर ले, तो यह शुभ माना जाता है — पितरों ने श्राद्ध स्वीकार किया।
एकादशी श्राद्ध के लिए महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान सुझाव
हिन्दू शास्त्रों में एकादशी श्राद्ध का महत्त्व
सही तिथि पर श्राद्ध करने का महत्त्व गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से वर्णित है — यह मृत्यु, परलोक और पितृ-कर्म से सम्बन्धित प्रमुख पुराणिक ग्रन्थ है। गरुड़ पुराण में विस्तार से बताया गया है कि जब दिवंगत की आत्मा को उनकी तिथि पर उचित रूप से श्राद्ध द्वारा सम्मानित किया जाता है, तो उन्हें पोषण प्राप्त होता है। यह पोषण उन्हें अस्तित्व के जिस भी लोक में वे हों — पितृलोक, पुनर्जन्म-क्षेत्र, या किसी मध्यवर्ती अवस्था में — वहाँ पहुँचता है।
स्मृति-परम्परा के अनुसार सही तिथि पर किए गए अर्पण समस्त पितरों तक सार्वभौमिक रूप से पहुँचते हैं — जैसे वर्षा का जल किसी जलाशय में पहुँचकर पूरे क्षेत्र को लाभ देता है। एकादशी तिथि स्वयं भगवान विष्णु की प्रिय तिथि होने के कारण इस दिन किए गए श्राद्ध को अतिरिक्त पुण्य की प्राप्ति होती है।
धर्म सिन्धु और निर्णय सिन्धु — जो हिन्दू धर्मशास्त्र के प्रामाणिक मध्यकालीन निबन्ध हैं — दोनों इस बात पर बल देते हैं कि पूर्वज की मृत्यु-तिथि पर श्राद्ध करना सबसे पूर्ण अनुष्ठान-निर्वहन है। बिना वैध कारण के सही तिथि चूकना पितृ ऋण का एक रूप माना जाता है। यह ऋण जीवित वंशजों के जीवन में बाधाओं के रूप में प्रकट हो सकता है।
एकादशी श्राद्ध के करणीय एवं वर्जित कार्य
करणीय कार्य:
- श्राद्ध अपराह्न काल के भीतर कुतप या रोहिण मुहूर्त में करें
- सभी तर्पण अर्पणों में काले तिल (काले तिल / kale til) का प्रयोग करें
- सात्विक भोजन तैयार करें: चावल, दाल, बिना प्याज या लहसुन के पकी सब्जियाँ
- पंच बलि (पाँच अंश) के रूप में ब्राह्मण, कौवे, गाय, कुत्ते और चींटियों को भोजन कराएँ
- संकल्प और पिंड दान के दौरान प्रत्येक पूर्वज का नाम और गोत्र बोलें
- पूरे दिन शारीरिक और मानसिक पवित्रता बनाए रखें
- किसी पवित्र जल-स्थान पर श्राद्ध करें — नदी-संगम सर्वाधिक शुभ है
वर्जित कार्य:
- इस दिन प्याज, लहसुन, माँस, मछली, अंडे या मदिरा का सेवन न करें
- सूर्यास्त के बाद श्राद्ध न करें — अनुष्ठान सन्ध्या से पूर्व समाप्त होना चाहिए
- श्राद्ध के अनुष्ठानों के लिए लोहे के बर्तन न लें — ताँबे, काँसे या चाँदी को प्राथमिकता दें
- इस दिन झगड़ा, कटुवचन या सांसारिक सुखों में लिप्त न हों
- ब्राह्मण भोजन न छोड़ें — इसे अनुष्ठान-पूर्णता का अभिन्न अंग माना जाता है
- मुख्य अनुष्ठान के दौरान पादत्राण (जूते-चप्पल) न पहनें
- पिंडों को जल में अर्पित करते समय प्लास्टिक की थैलियों या कृत्रिम सामग्रियों का प्रयोग न करें
Prayag Pandits के साथ त्रिवेणी संगम पर एकादशी श्राद्ध करें
प्रयागराज का त्रिवेणी संगम — गंगा, यमुना और रहस्यमयी सरस्वती का पवित्र संगम — वैदिक काल से ही पितृ-कर्मों के लिए सबसे शक्तिशाली स्थलों में से एक माना जाता रहा है। मत्स्य पुराण के अनुसार प्रयाग में पिंड दान एवं तर्पण से अनेक पीढ़ियों के पितरों को मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि पितृ पक्ष के दौरान हज़ारों परिवार अपने पितृ-श्राद्ध के लिए विशेष रूप से प्रयागराज आते हैं।
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पितृ पक्ष 2026 की सम्बन्धित श्राद्ध तिथियाँ
एकादशी श्राद्ध पितृ पक्ष में मनाई जाने वाली पंद्रह श्राद्ध तिथियों में से एक है। एकादशी श्राद्ध के आस-पास की तिथियाँ हैं — 7 अक्टूबर को द्वादशी श्राद्ध (जो माघ श्राद्ध का भी दिन है), 8 अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध, 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध, और 10 अक्टूबर को समापन श्राद्ध — सर्व पितृ अमावस्या। यदि आप अपने पूर्वज के निधन की सटीक तिथि के बारे में अनिश्चित हों, तो उनका श्राद्ध अमावस्या पर करें — जो समस्त दिवंगत आत्माओं के लिए सार्वभौमिक दिन है।
पितृ पक्ष के सम्पूर्ण अनुष्ठान-चक्र की विस्तृत जानकारी के लिए हमारा पिंड दान मार्गदर्शिका पढ़ें। पिंड दान की मूल विधि के लिए पिंड दान के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देखें। पितृ ऋण का महत्त्व समझने और श्राद्ध द्वारा उसके निवारण के लिए, पिंड दान, श्राद्ध और पितृ ऋण विषय पर हमारे पंडित जी से परामर्श लें।
एकादशी श्राद्ध 2026 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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