फल्गु नदी भूमिगत क्यों बहती है और क्या वहाँ अस्थि विसर्जन मान्य है?
फल्गु नदी के भूमिगत प्रवाह को हिंदू शास्त्रीय परंपरा की एक मार्मिक कथा से समझाया जाता है। जब भगवान राम अपने पिता दशरथ के लिए पिंड दान करने गया आए, तब उन्होंने सीता से नदी तट पर प्रतीक्षा करने को कहा। शुभ समय आने पर भी राम वापस नहीं लौटे, तो दशरथ की आत्मा सीता के सामने प्रकट हुई और अर्पण मांगा। सीता ने फल्गु नदी की रेत से स्वयं पिंड दान किया, और नदी, पास की गाय, तुलसी के पौधे और एक ब्राह्मण को साक्षी बनाया।
जब राम लौटे और उन्होंने सीता की बात पर संदेह किया, तब फल्गु नदी — राम के क्रोध से डरकर — अर्पण की साक्षी होने से मुकर गई। इस विश्वासघात से दुखी होकर सीता ने नदी को सदा भूमिगत बहने का शाप दिया। इसी कारण फल्गु को “अन्तःसलिला” कहा जाता है — सतह के नीचे बहने वाली नदी।
भूमिगत प्रवाह के बावजूद फल्गु में अस्थि विसर्जन पूर्ण रूप से मान्य है। पवित्र जल वर्ष भर रेत के नीचे उपस्थित माना जाता है, और मानसून व पितृपक्ष के समय (सितंबर-अक्टूबर) सतही जल स्पष्ट दिखाई देता है। वायु पुराण पुष्टि करता है कि फल्गु की पवित्रता उसके दृश्य प्रवाह पर निर्भर नहीं होती।
अस्थि विसर्जन कराना है?
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