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ओड़िया परंपरा में मृत्यु के बाद 10-दिवसीय दशाह अवधि में क्या होता है?

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दशाह विधि मृत्यु के तुरंत बाद के दस दिनों को समेटती है, जब परिवार अशौच का पालन करता है। दिन 1 से 9 तक श्मशान स्थल या घर के पूजास्थान पर प्रतिदिन पिंड अर्पण किया जाता है। गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में वर्णित सूक्ष्म शरीर की रचना के अनुसार प्रत्येक दिन दिवंगत आत्मा के सूक्ष्म शरीर का अलग अंग बनने से जुड़ा माना जाता है: सिर, गर्दन, कंधे, छाती, पीठ, नाभि, जाँघें, घुटने और पैर। दिन 10 पर कर्ता और पुरुष परिवारजन क्षौर कर्म करते हैं, जिसके बाद शय्यादान — ब्राह्मण को बिस्तर और बिछौना दान — किया जाता है। दिन 11 में एकोद्दिष्ट श्राद्ध होता है, अर्थात केवल दिवंगत के लिए व्यक्तिगत अर्पण। दिन 12 से 13 तक सपिण्डीकरण पूरा होता है — दिवंगत आत्मा का पितृगण के साथ औपचारिक विलय, जो प्रेत से पितृ स्थिति में परिवर्तन को चिह्नित करता है।

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