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द्वादश ज्योतिर्लिंग: उत्पत्ति की कथा एवं भारत के 12 पावन शिव-धामों की महिमा

Prakhar Porwal · 2 मिनट पढ़ें
मुख्य बिंदु
    इस लेख में
    भगवान शिव के वे दिव्य स्थान, जहाँ वे अनेक रूपों में निवास करते हैं, ज्योतिर्लिंग कहलाते हैं। इस शब्द का अर्थ ही इसकी महिमा बताता है। ‘ज्योति’ का अर्थ है ‘प्रकाश’ अथवा ‘तेज’, और ‘लिंग’ का अर्थ है ‘चिह्न’ या ‘स्वरूप’। ज्योतिर्लिंग का शाब्दिक अर्थ है “भगवान शिव के तेजोमय चिह्न।” वर्तमान में भारत में 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंग हैं, और प्रत्येक की उत्पत्ति की अपनी एक पावन कथा है। 

    ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कथा

    शिव पुराण के अनुसार सहस्रों वर्ष पूर्व एक प्रसंग का वर्णन मिलता है। जब भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा इस विषय पर वार्तालाप कर रहे थे कि उनमें से सर्वोच्च कौन है, तो उनकी चर्चा विवाद में बदल गई। तब भगवान शिव उस विवाद को समाप्त करने प्रकट हुए उन्होंने वहाँ एक अनंत प्रकाश-स्तम्भ प्रकट किया, जो प्रकट होते ही तीनों लोकों को भेदता हुआ चला गया। फिर भगवान शिव ने दोनों से कहा कि जो भी उस प्रकाश का अंत पहले खोज लेगा, वही सर्वोच्च देव माना जाएगा दोनों विपरीत दिशाओं में चल पड़े और बहुत समय पश्चात् भी कोई स्तम्भ का अंत न पा सका। तब भगवान विष्णु ने पराजय स्वीकार की और भगवान शिव से कहा कि उन्हें स्तम्भ का अंत नहीं मिला, जबकि भगवान ब्रह्मा ने असत्य कहा कि वे अंत तक पहुँच गए हैंवाराणसी ज्योतिर्लिंगअसत्य देखकर भगवान शिव क्रोधित हो उठे और उन्होंने भगवान ब्रह्मा को शाप दिया। यद्यपि वे सृष्टि के रचयिता हैं, फिर भी उनकी पूजा कोई नहीं करेगा अपने उसी क्रोध में, भगवान शिव लिंगोद्भव रूप में प्रकट हुए — एक अनंत प्रकाश-स्तम्भ जो पृथ्वी पर 64 स्थानों पर प्रकट हुआ उन 64 स्थानों में से केवल 12 प्रमुख माने जाते हैं, और आज वे ही भारत के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजित हैं। भगवान शिव प्रत्येक ज्योतिर्लिंग में किसी न किसी रूप में निवास करते हैं और सभी भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। 

    भारत के 12 ज्योतिर्लिंग मंदिरों की सूची

    • सोमनाथ मंदिर, गुजरात
    • मल्लिकार्जुन मंदिर, आंध्र प्रदेश
    • महाकालेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश
    • ओंकारेश्वर मंदिर एवं ममलेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश
    • बैद्यनाथ धाम, झारखंड
    • भीमाशंकर मंदिर, महाराष्ट्र
    • रामनाथस्वामी मंदिर, रामेश्वरम्
    • नागेश्वर मंदिर, गुजरात
    • काशी विश्वनाथ मंदिर, उत्तर प्रदेश
    • त्र्यंबकेश्वर मंदिर, महाराष्ट्र
    • केदारनाथ मंदिर, उत्तराखंड
    • घृष्णेश्वर मंदिर, महाराष्ट्र
    क्रम सं.ज्योतिर्लिंग का नामज्योतिर्लिंग का स्थानविवरण
    1सोमनाथ मंदिरवेरावल, सौराष्ट्र, गुजरातयह भारत के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक है, और माना जाता है कि यह सबसे पहले प्रकट होने वाला ज्योतिर्लिंग है।
    2मल्लिकार्जुन मंदिरश्रीशैलम, आंध्र प्रदेशइसे माता सती के 52 शक्तिपीठों में से एक भी माना जाता है।
    3महाकालेश्वर मंदिरउज्जैन, मध्य प्रदेशमहाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग देश के सात मुक्ति-स्थलों में से एक है।
    4ओंकारेश्वर मंदिरखंडवा, मध्य प्रदेशओंकारेश्वर, नर्मदा नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग, जिसका शाब्दिक अर्थ है “ॐकार ध्वनि के स्वामी।”
    5बैद्यनाथ धामदेवघर, झारखंडस्थल-परम्परा के अनुसार रावण ने बलिदान-स्वरूप अपने दसों सिर एक-एक करके शिव को अर्पित किए। प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और घायल रावण को स्वस्थ किया। चिकित्सक रूप धारण करने के कारण उन्हें वैद्यनाथ कहा गया। मंदिर का यही नाम शिव के इसी रूप पर पड़ा।
    6भीमाशंकर मंदिरखेड़ तालुका, पुणे, महाराष्ट्रभीमाशंकर महाराष्ट्र के सर्वाधिक लोकप्रिय पदयात्रा-स्थलों में से एक है। यहाँ ज्योतिर्लिंग की उपस्थिति इसकी प्रसिद्धि का एक प्रमुख कारण है। पारम्परिक मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना कुम्भकर्ण-पुत्र भीम ने की थी, और यह चारों ओर हरियाली से घिरा है।
    7रामनाथस्वामी मंदिररामेश्वरम्, तमिलनाडुरामनाथस्वामी मंदिर में बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक स्थापित है। यह मंदिर अद्भुत स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। भव्य गोपुर, उत्कीर्ण स्तम्भ और विशाल गलियारे आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे। रामनाथस्वामी मंदिर भगवान राम की भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति का प्रतीक है। ‘रामनाथस्वामी’ नाम का अर्थ है ‘राम के स्वामी’, जो इस भक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
    8नागेश्वर मंदिरद्वारका के निकट, गुजरातयह मंदिर समस्त प्रकार के विष और जहर से रक्षा का प्रतीक है, और इसे भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है।
    9काशी विश्वनाथ मंदिरवाराणसी, उत्तर प्रदेशयह वह स्थल है जहाँ शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंगम् दोनों एक साथ विद्यमान हैं। इसे शिव के समस्त मंदिरों में सर्वाधिक पावन माना जाता है। प्रमुख देव का नाम विश्वनाथ या विश्वेश्वर है, अर्थात् “ब्रह्माण्ड के स्वामी।” मंदिर-नगरी काशी को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित नगरी माना जाता है, जिसका 3500 वर्षों का प्रलेखित इतिहास है।
    10त्र्यंबकेश्वर मंदिरत्र्यंबक, नासिक, महाराष्ट्रत्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग, ब्रह्मगिरि पर्वत के निकट स्थित, प्रसिद्ध गोदावरी नदी का उद्गम-स्थल भी है। दक्षिणी गंगा एवं गौतमी गंगा इसके दो अन्य नाम हैं। स्थल-परम्परा के अनुसार गोदावरी नदी और गौतम ऋषि ने भगवान शिव से त्र्यंबकेश्वर में निवास करने की प्रार्थना की, जिसके फलस्वरूप शिव ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए। विशेष बात यह है कि अन्य ज्योतिर्लिंगों के विपरीत त्र्यंबकेश्वर का ज्योतिर्लिंग भिन्न आकार का है — इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर इन तीन सर्वोच्च शक्तियों के प्रतीक तीन शिखर हैं।
    11केदारनाथ मंदिरकेदारनाथ, उत्तराखंडकेदारनाथ हिन्दू धर्म के लघु चार धाम तीर्थ-परिक्रमा का अंग है। हिमाच्छादित हिमालय में छिपा केदारनाथ का प्राचीन मंदिर कथाओं और परम्पराओं से ओतप्रोत है। यह वर्ष में केवल छह माह ही दर्शनार्थ खुलता है। तेवारम् में भी इसका उल्लेख वड़नाडु के पाडल पेट्र स्थलम् के रूप में मिलता है। पारम्परिक मान्यता है कि शिव वराह-रूप धारण कर केदारनाथ में पृथ्वी में समा गए और नेपाल की काठमांडू घाटी के डोलेश्वर में पुनः प्रकट हुए। वराह-रूप में होने वाली पीड़ा के कारण केदारनाथ के लिंग पर शुद्ध घृत का लेप किया जाता है।
    12घृष्णेश्वर मंदिरऔरंगाबाद, महाराष्ट्रशिव पुराण में उल्लिखित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, जिसे घृष्णेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। शिव पुराण के अनुसार घृष्णेश्वर शिव के ज्योतिर्लिंगों में से एक है और महाराष्ट्र के एलोरा में, एलोरा गुफाओं से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित है।

    सोमनाथ मंदिर, गुजरात

    सोमनाथ भारत के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक है, और माना जाता है कि यह सबसे पहले प्रकट होने वाला ज्योतिर्लिंग है। तीर्थयात्री और भक्त सोमनाथ को अत्यंत श्रद्धा से देखते हैं और इसे आध्यात्मिक ज्ञान का शिखर मानते हैं।
    सोमनाथ मंदिर, गुजरात
    सोमनाथ मंदिर, गुजरात
    यह आश्चर्य की बात नहीं कि यह भारत का सर्वाधिक श्रद्धेय तीर्थस्थल है। मंदिर परिसर की वास्तुकला चालुक्य-शैली से प्रेरित है, जिसमें भगवान शिव का अत्यंत सुंदर मंदिर सम्मिलित है। पारम्परिक मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं इस मंदिर में आए थे। यह मंदिर इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसके साथ अनेक रोचक कथाएँ जुड़ी हुई हैं।

    सोमनाथ मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

    पारम्परिक मान्यता के अनुसार चन्द्रदेव ‘सोमदेव’ की 27 पत्नियाँ थीं (जो दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं), लेकिन वे केवल रोहिणी से प्रेम करते थे और शेष की उपेक्षा कर देते थेदक्ष प्रजापति ने चन्द्रदेव को शाप दिया कि रात्रि का अंधकार उनकी कान्ति को नष्ट कर देगा। तेजहीन हुए चन्द्रदेव ने आज के सोमनाथ मंदिर के स्थान पर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग की 4000 वर्षों तक प्रार्थना की भगवान शिव चन्द्र की भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उन्हें यह वरदान दिया कि वे प्रत्येक माह केवल 15 दिन ही क्षीण होंगे। अपनी कान्ति पुनः प्राप्त करने के पश्चात् चन्द्रदेव ने शिव को धन्यवाद-स्वरूप यह मंदिर बनवाया। कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने ही चन्द्रदेव को भगवान शिव के लिए मंदिर निर्माण का परामर्श दिया था। माना जाता है कि यह मंदिर 320 से 500 ईस्वी के बीच निर्मित हुआ। मूल मंदिर शुद्ध स्वर्ण और रजत से निर्मित बताया जाता है, लेकिन अरब और अफ़गान आक्रमणकारियों तथा मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब ने विभिन्न समयों पर इसे भारी क्षति पहुँचाई। इन आक्रमणों ने मंदिर का समस्त कोष लूट लिया। इतने सब आक्रमणों और विध्वंस के बाद भी इस धार्मिक स्थल का गौरव अक्षुण्ण रहा। सरदार वल्लभभाई पटेल के निर्देश पर 1947 में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ, और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के हाथों ज्योतिर्लिंग की प्रतिष्ठा कराई गई। मंदिर का समय — सुबह 6:00 बजे से रात 10:00 बजे तक 

    मल्लिकार्जुन मंदिर, आंध्र प्रदेश

    मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मंदिर श्री शैल पर्वत की चोटी पर स्थित है और यह भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से अंतिम है। उत्कृष्ट वास्तुकला और शिल्पकला से सुसज्जित यह मंदिर कृष्णा नदी का मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है।मल्लिकार्जुन मंदिर आंध्र प्रदेश का यह ज्योतिर्लिंग माता सती के 52 शक्तिपीठों में से एक भी माना जाता है। भारत के इन ज्योतिर्लिंगों की तीर्थयात्रा आपके लिए सबसे आध्यात्मिक रूप से समृद्ध अनुभव होगा। यह जितनी सम्पूर्ण है, उतनी ही संतोषप्रद भी।

    मल्लिकार्जुन मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     स्थल-परम्परा के अनुसार महाभारत के पाण्डवों में से अर्जुन ने भगवान शिव के इस मंदिर का निर्माण करवाया था। समीप बहती कुम्भला नदी इस क्षेत्र की शान्ति और प्राकृतिक सौंदर्य में और वृद्धि करती है। मंदिर रामायण और महाभारत के दृश्यों को दर्शाती मनोहर भित्ति-शिल्पकलाओं और उत्कीर्णनों से सुशोभित है। मंदिर की भव्य प्रतिमाएँ उस काल के होयसल कलाकारों के अद्भुत शिल्प-कौशल को प्रदर्शित करती हैं। इस मंदिर का एक विशेष आकर्षण यक्षगान प्रदर्शन है, जो प्रतिदिन संध्या-काल में होता है। शिव पुराण के अनुसार जब भगवान शिव अपनी पत्नी देवी पार्वती के साथ अपने पुत्र कार्तिकेय को सान्त्वना देने पधारे — कार्तिकेय अपने छोटे भाई गणेश के पहले विवाह से अप्रसन्न थे — तब शिव ने क्रौंच पर्वत पर ज्योतिर्लिंग का रूप धारण किया। इस मंदिर में मल्लिकार्जुन (शिव) और भ्रमराम्बा (पार्वती) विराजित हैं। यह एकमात्र ऐसा शिव-मंदिर है जहाँ श्रद्धालुओं को मूर्तियों को स्पर्श करने की अनुमति है, जबकि यह अन्य सभी शिव-मंदिरों में निषिद्ध है। मंदिर का समय — सुबह 4:30 बजे से रात 10:00 बजे तक

    महाकालेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश

    उज्जैन के महाकाल वन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर के विषय में पारम्परिक मान्यता है कि इसका निर्माण पाँच वर्षीय बालक श्रीकर ने किया था। यह मंदिर क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है, और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग देश के सात मुक्ति-स्थलों में से एक है।
    महाकालेश्वर मंदिर
    महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन
    ‘भस्म-आरती’ इस मंदिर का प्रमुख आकर्षण है — यह प्रातःकाल की प्रथम आरती है जिसमें ताज़ी चिता-भस्म से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। सावन मास में और नाग पंचमी पर विशेष रूप से, संसार-भर से सहस्रों तीर्थयात्री यहाँ दर्शन हेतु आते हैं।

    महाकालेश्वर मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     महाकालेश्वर मंदिर से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएँ हैं, लेकिन सबसे प्रचलित यह है कि स्थल-परम्परा के अनुसार भगवान शिव दूषण नामक असुर का वध करने उज्जैन में पृथ्वी से प्रकट हुए थे, जिसका उज्जैन के प्रजाजनों और ब्राह्मणों पर अत्याचार सीमा पार कर चुका था। उस असुर का वध करने के पश्चात् भगवान शिव ने ज्योतिर्लिंग का रूप धारण किया, और तभी से वे इस पावन नगरी में निवास कर अपने भक्तों पर दिव्य कृपा बरसा रहे हैं। मंदिर का समय — सुबह 3:00 बजे से रात 11:00 बजे तक

    ओंकारेश्वर मंदिर एवं ममलेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश

    ओंकारेश्वर, नर्मदा नदी पर स्थित प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग, का शाब्दिक अर्थ है “ॐकार ध्वनि के स्वामी।” यह मंदिर अपनी पौराणिक महिमा के लिए विख्यात है। पारम्परिक मान्यता के अनुसार देवों और दानवों के बीच एक संग्राम हुआ था। जब देवों ने भगवान शिव से प्रार्थना की, तो शिव ने उनका पक्ष लिया और बुराई पर विजय में सहायता हेतु ओंकारेश्वर के रूप में प्रकट हुए।ओंकारेश्वरशिवरात्रि, महाशिवरात्रि और कार्तिक पूर्णिमा के अवसरों पर सहस्रों भक्त ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु यहाँ उमड़ पड़ते हैं। पावन नर्मदा नदी की शान्त तरंगें और भव्य दृश्य इन मंदिरों की पवित्रता को और बढ़ाते हैं। एक छोटी सी पर्वत-शृंखला ममलेश्वर मंदिर को ओंकारेश्वर से अलग करती है।

    ओंकारेश्वर मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     पौराणिक मान्यता के अनुसार ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी तीन कथाएँ प्रचलित हैं। प्रथम कथा के अनुसार ‘विन्ध्य पर्वत’ ने भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिव यहाँ प्रकट हुए और विन्ध्य पर्वत को ‘मेरु पर्वत’ से बड़ा होने का वरदान दिया। देवों और ऋषियों की प्रार्थना पर विन्ध्य पर्वत द्वारा पूजित लिंग दो भागों में विभाजित हो गया — ‘ओंकारेश्वर’ और ‘ममलेश्वर’। तभी से ओंकारेश्वर और ममलेश्वर मंदिरों को एक ही शिवलिंग के दो रूप माना जाता है। दूसरी कथा के अनुसार राजा मान्धाता और उनके दोनों पुत्रों ने तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए। तीसरी कथा के अनुसार देवों और असुरों के मध्य एक भीषण युद्ध में भगवान शिव ने ओंकारेश्वर रूप में असुरों पर विजय पाई।

    बैद्यनाथ धाम, झारखंड

    झारखंड में स्थित एक अन्य प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग वैद्यनाथ की उत्पत्ति-कथा अत्यंत रोचक है। वस्तुतः यह कथा बहुत प्रचलित है। पारम्परिक मान्यता के अनुसार रावण, जो शिव का परम भक्त था, वर्षों तक उन्हें लंका बुलाने का प्रयत्न करता रहा।बैद्यनाथ धामइस अवधि में रावण को चोट भी आई। जब भगवान शिव अपने भक्त से मिलने पहुँचे, तब रावण की स्वास्थ्य-स्थिति ठीक नहीं थी। शिव ने स्वयं रावण को स्वस्थ किया, और इसी कारण उन्हें वैद्यनाथ कहा गया। प्रत्येक वर्ष विशेष रूप से महाशिवरात्रि और श्रावण मास में सहस्रों भक्त इस मंदिर में आते हैं।

    बैद्यनाथ धाम मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     स्थल-परम्परा के अनुसार रावण ने भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने हेतु यहीं अपने दसों सिर बलिदान किए। बाद में भगवान शिव ने वैद्य (चिकित्सक) रूप धारण कर सिरों को पुनः जोड़ दिया, और इसी कारण इस स्थान का नाम बैद्यनाथ धाम पड़ा। पारम्परिक मान्यता है कि इस मंदिर में प्रार्थना करने से भक्तों को स्वस्थ और समृद्ध जीवन प्राप्त होता है। मानसून के मास (जुलाई और अगस्त) में यह मंदिर भारी संख्या में भक्तों को आकर्षित करता है। मंदिर का समय — सुबह 4:00 बजे से रात 9:00 बजे तक 

    भीमाशंकर मंदिर, महाराष्ट्र

    भीमाशंकर महाराष्ट्र के सर्वाधिक लोकप्रिय पदयात्रा-स्थलों में से एक है। यहाँ ज्योतिर्लिंग की उपस्थिति इसकी प्रसिद्धि का एक प्रमुख कारण है। पारम्परिक मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना कुम्भकर्ण-पुत्र भीम ने की थी, और यह चारों ओर हरियाली से घिरा है। आश्चर्य की बात है कि यह भीमा नदी के तट पर भी स्थित है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यह स्थल मेले जैसे रूप में परिवर्तित हो जाता है, और राज्य भर से भक्त यहाँ उमड़ पड़ते हैं। यह भारत के सर्वाधिक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में से एक है, और यहाँ की यात्रा अत्यंत संस्तुत है।भीमाशंकरमंदिर का गर्भ-गृह नागर शैली (भारतीय आर्य स्थापत्य) में निर्मित है और इसमें राजस्थानी एवं गुजराती प्रभावों का सुन्दर मिश्रण है। मंदिर की बाह्य भित्तियों पर शिव लीला, कृष्ण लीला, रामायण और महाभारत के दृश्य उत्कीर्ण हैं। 18वीं शताब्दी में नाना फडणवीस ने इस मनमोहक भक्ति-स्थल का विकास किया था। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ सहस्रों भक्त आते हैं।

    भीमाशंकर मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध करने हेतु रुद्र-रूप धारण किया। यह त्रिपुरासुर एक क्रूर असुर था, जो स्वर्ग, नरक और पाताल — तीनों लोकों को नष्ट करने पर तुला था। उस असुर का वध करने के पश्चात् भगवान शिव विश्राम हेतु सह्याद्रि पर्वतमाला में बैठ गए। उसी समय उनके स्वेद-बिंदु बहने लगे और वे भीमा नदी का रूप ले लिए। देवों की प्रार्थना पर भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के अवतार में इन्हीं पर्वतों में निवास करने लगे। मंदिर का समय — सुबह 5:00 बजे से रात 9:00 बजे तक 

    रामनाथस्वामी मंदिर, रामेश्वरम्

    तमिलनाडु का पावन नगर रामेश्वरम् हिन्दुओं के लिए असीम धार्मिक महत्त्व रखता है, और इसे ‘चार धाम’ तीर्थ-स्थलों में गिना जाता है। रामनाथस्वामी मंदिर में बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक स्थापित है। यह मंदिर अद्भुत स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। भव्य गोपुर, उत्कीर्ण स्तम्भ और विशाल गलियारे आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे। रामनाथस्वामी मंदिर भगवान राम की भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति का प्रतीक है। ‘रामनाथस्वामी’ नाम का अर्थ है ‘राम के स्वामी’, जो इस भक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।रामनाथस्वामी मंदिरपारम्परिक मान्यता है कि लंका से लौटने के पश्चात् भगवान राम ने भगवान शिव की पूजा कर रामेश्वरम् को पवित्र किया — उन्होंने उस रावण का वध किया था जिसने उनकी पत्नी देवी सीता का अपहरण किया था। राम अपने पाप के प्रायश्चित-स्वरूप शिवलिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सबसे विशाल लिंगम् लाने हेतु हनुमान जी को हिमालय भेजा। हनुमान जी को शिवलिंग लाने में अधिक समय लगा, अतः देवी सीता ने स्वयं बालू से शिवलिंग का निर्माण कर दिया। 

    रामनाथस्वामी मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     स्थल-परम्परा के अनुसार यहाँ का मूल शिवलिंग माता सीता द्वारा निर्मित है, और रावण-वध के पश्चात् अयोध्या लौटते समय भगवान राम ने इसकी पूजा की थी। 12वीं शताब्दी में पाण्ड्य राजवंश के शासकों ने इस मंदिर परिसर का विस्तार किया। श्रीलंका के शासकों ने भी मंदिर निर्माण में योगदान दिया। जाफना राज्य के जयवीर सिंकाइयरियन और उनके उत्तराधिकारी गुणवीर सिंकाइयरियन ने मुख्य मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया। आज जो रामेश्वरम् मंदिर हम देखते हैं, वह असंख्य पीढ़ियों के शिव-भक्तों के सम्मिलित प्रयत्नों का परिणाम है। मंदिर के निर्माण में रामनाथपुरम् के सेतुपति राजाओं की प्रमुख भूमिका रही। यह सब 17वीं शताब्दी में दलवै सेतुपति द्वारा महान पूर्वी गोपुर के एक भाग के निर्माण से आरम्भ हुआ। 18वीं शताब्दी के अंत में मुथुरामलिंग सेतुपति ने विश्व-प्रसिद्ध तीसरे गलियारे (‘चोक्कट्टन मंडपम्’ नाम से प्रख्यात) का निर्माण कराया। वर्ष 1500 के लगभग विजयनगर के राजाओं ने तलवार और तुरही धारण किए वीरभद्र की आकृति वाले मिश्र स्तम्भों का निर्माण कराया। रामेश्वरम् द्वीप और इसके आसपास 64 तीर्थ (पवित्र जलस्रोत) हैं, जिनमें से 24 तीर्थों का (स्कन्द पुराण के अनुसार) विशेष महत्त्व है। मान्यता है कि रामेश्वरम् की तीर्थयात्रा तपस्या के समान फलदायी है। रामनाथस्वामी मंदिर के भीतर ही इनमें से 22 तीर्थ स्थित हैं। संख्या 22 का विशेष अर्थ है — यह राम के तरकश का प्रतीक है, जिसमें 22 बाण थे। पहला और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीर्थ समुद्र में स्थित है और ‘अग्नि तीर्थम्’ कहलाता है। इस तीर्थ में लोग पवित्र स्नान करते हैं। पारम्परिक मान्यता है कि निःसंतान दम्पति यदि इस तीर्थ में स्नान कर भगवान शिव की प्रार्थना करते हैं, तो उन्हें संतान-प्राप्ति का वर मिलता है। पूर्णिमा (पूर्ण चन्द्र दिवस) और अमावस्या (नव चन्द्र दिवस) यहाँ स्नान के लिए सर्वाधिक शुभ माने जाते हैं। मंदिर का समय — सुबह 4:30 बजे से रात 8:30 बजे तक 

    नागेश्वर मंदिर, गुजरात

    नागेश्वर भारत का एक अन्य प्रमुख ज्योतिर्लिंग है, जो पश्चिम में सौराष्ट्र, गुजरात के तट पर पाया जाता है। नागनाथ का यह मंदिर, जिसके दोनों ओर गोमती द्वारका और बेट द्वारका स्थित हैं, अपनी रोचक संरचना और परिवेश के कारण बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों और दर्शनार्थियों को आकर्षित करता है। यह मंदिर समस्त प्रकार के विष और जहर से रक्षा का प्रतीक है, और इसे भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है।नागेश्वर मंदिरमंदिर के निर्माण की निश्चित तिथि अज्ञात है, लेकिन 1996 में स्वर्गीय गुलशन कुमार ने इसका पुनर्निर्माण कराया। प्रत्येक वर्ष सहस्रों तीर्थयात्री यहाँ भगवान शिव से आशीर्वाद हेतु आते हैं, जिनकी पूजा यहाँ ‘नागदेव’ के रूप में होती है। इस मंदिर की प्रमुख विशेषता है भगवान शिव की 25-मीटर ऊँची बैठी हुई मुद्रा वाली प्रतिमा, जो स्मृति-चित्र के लिए मनोरम पृष्ठभूमि बनाती है।

    नागेश्वर मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती ने दारुक नामक एक असुर को वरदान दिया था। दारुक उन वरदानों का दुरुपयोग कर स्थानीय जनों पर अत्याचार करता था और उसने सुप्रिया नामक एक शिव-भक्त सहित अनेक लोगों को बंदी बना लिया था। दारुक से रक्षा हेतु सुप्रिया के परामर्श पर सबने शिव-मंत्र का जप आरम्भ किया। दारुक क्रोधित होकर सुप्रिया का वध करने दौड़ा, तभी भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने सुप्रिया तथा अन्य भक्तों की रक्षा की। तभी से नागेश्वर मंदिर में इस ज्योतिर्लिंग की पूजा होती आ रही है। मंदिर का समय — सुबह 5:00 बजे से रात 9:00 बजे तक

    काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी

     काशी विश्वनाथ भारत के सर्वाधिक श्रद्धेय ज्योतिर्लिंगों में से एक है। पारम्परिक मान्यता है कि यह ज्योतिर्लिंग भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच हुए विवाद के परिणाम-स्वरूप प्रकट हुआ। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा समान रूप से होगी, पर असत्य कहने के कारण भगवान ब्रह्मा बहिष्कृत रहेंगे। इस मंदिर में भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की पूजा की जाती है!वाराणसी गंगा आरती काशी विश्वनाथ मंदिरवर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार 1780 में रानी अहिल्याबाई होलकर ने कराया। मंदिर के शिखर स्वर्ण-मण्डित हैं, और प्रत्येक पर एक स्वर्ण छत्री है। ‘मकर संक्रान्ति,’ ‘कार्तिक पूर्णिमा,’ ‘शिवरात्रि,’ ‘महाशिवरात्रि,’ ‘देव दीपावली,’ और ‘अन्नकूट’ के पावन अवसरों पर संसार-भर से तीर्थयात्री काशी पधारते हैं।

    काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव अग्नि के एक अनंत स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए, ताकि भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच चल रहे सर्वोच्चता के विवाद का अंत किया जा सके। जब विष्णु और ब्रह्मा ने उस स्तम्भ को देखा, तो उसके अंत तक पहुँचने हेतु दोनों विपरीत दिशाओं में चल पड़े। दोनों उसका अंत न पा सके, लेकिन भगवान ब्रह्मा ने मिथ्या दावा किया कि उन्होंने स्तम्भ का अंत खोज लिया है। यह देखकर भगवान शिव क्रोधित हो उठे और उन्होंने ब्रह्मा को शाप दिया कि उनकी पूजा कोई नहीं करेगा, और भगवान विष्णु को सर्वोच्च देव की उपाधि प्रदान की। अग्नि-स्तम्भ विलीन हो गए, लेकिन उसका एक छोटा अंश काशी में विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित रहा। मंदिर का समय — सुबह 3:00 बजे से रात 11:00 बजे तक 

    त्र्यंबकेश्वर मंदिर, महाराष्ट्र

    त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग, ब्रह्मगिरि पर्वत के निकट स्थित, प्रसिद्ध गोदावरी नदी का उद्गम-स्थल भी है। दक्षिणी गंगा एवं गौतमी गंगा इसके दो अन्य नाम हैं। स्थल-परम्परा के अनुसार गोदावरी नदी और गौतम ऋषि ने भगवान शिव से त्र्यंबकेश्वर में निवास करने की प्रार्थना की, जिसके फलस्वरूप शिव ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए। विशेष बात यह है कि अन्य ज्योतिर्लिंगों के विपरीत त्र्यंबकेश्वर का ज्योतिर्लिंग भिन्न आकार का है — इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर इन तीन सर्वोच्च शक्तियों के प्रतीक तीन शिखर हैं।

    त्र्यंबकेश्वर मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     स्थल-परम्परा के अनुसार ऋषि गौतम से अपने आश्रम में अनजाने में एक गाय की मृत्यु हो गई। अपने दोष के प्रायश्चित-स्वरूप उन्होंने भगवान शिव की पूजा की और गंगा नदी से शुद्धि की प्रार्थना की। नीचे प्रवाहित होते समय गंगा का नया नाम गोदावरी पड़ा।त्र्यंबकेश्वर मंदिरयह देखकर देवों ने भगवान शिव की स्तुति की और प्रार्थना की कि वे यहीं त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करें। एक अन्य परम्परा के अनुसार भगवान शिव यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक तीन लिंगों के रूप में निवास करते हैं, और इसी कारण इसका नाम ‘त्र्यंबकेश्वर’ पड़ा। ज्योतिर्लिंग दर्शन के अतिरिक्त तीर्थयात्री ‘कुशावर्त’ में पवित्र स्नान करते हैं — यह वही पावन स्थल है जहाँ से गोदावरी नदी का उद्गम होता है। मंदिर का समय — सुबह 5:30 बजे से रात 9:00 बजे तक

    केदारनाथ मंदिर, उत्तराखंड

    भारत का एक अन्य प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग, जो वर्ष के अधिकांश समय अगम्य रहता है, वह है केदारनाथ। शीत तापमान और हिमपात सहित कठोर जलवायु के कारण यह मंदिर तीर्थयात्रियों के लिए बंद रहता है।
    केदारनाथ मंदिर
    केदारनाथ मंदिर, उत्तराखंड
    पारम्परिक मान्यता है कि केदारनाथ मंदिर के भीतर स्थित कुण्ड के पावन गंगोत्री और यमुनोत्री-जल में डुबकी लगाने से भक्त अपने सभी कष्टों और संतापों से मुक्त हो जाते हैं। 

    केदारनाथ मंदिर, उत्तराखंड से जुड़ी पौराणिक कथा

    पारम्परिक मान्यता के अनुसार महाभारत-युद्ध के पश्चात् पाण्डवों ने अपने स्वजनों के वध के पाप से मुक्ति हेतु तपस्या की। उन्हें भगवान शिव की क्षमा-याचना करने का परामर्श मिला। इसी हेतु उन्होंने सर्वत्र खोज की और अंततः उन्हें केदारनाथ में, जहाँ आज ज्योतिर्लिंग स्थापित है, भगवान शिव मिले। स्थल-परम्परा के अनुसार भगवान शिव पाण्डवों से छिपते रहे, क्योंकि वे संग्राम में हुए छल और अकर्मों के लिए उन्हें क्षमा करने को उद्यत न थे। उन्होंने वृषभ का रूप धारण कर लिया और पृथ्वी में लोप हो गए। द्वितीय पाण्डव भीमसेन ने उन्हें पूँछ और पिछले पैरों से खींचकर बाहर निकालने का प्रयत्न किया। लेकिन भगवान शिव और गहराई में समा गए, और कई स्थानों पर अंशों के रूप में पुनः प्रकट हुए — कूबड़ केदारनाथ में, भुजाएँ तुंगनाथ में, नाभि और उदर मध्यमहेश्वर में, मुख रुद्रनाथ में, तथा केश और शीश कल्पेश्वर में। पाण्डवों ने इन पाँचों स्थानों पर शिव की पूजा हेतु मंदिर बनवाए, जो पंच केदार के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्हीं पूजा-कर्मों से उनके पाप क्षीण हुए। भगवान शिव ने इस पावन स्थल पर त्रिकोणाकार ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करने का संकल्प भी लिया। इसी कारण भक्त केदारनाथ को इतना उच्च स्थान देते हैं। मंदिर का समय — सुबह 4:00 बजे से रात 9:00 बजे तक

    घृष्णेश्वर मंदिर, महाराष्ट्र

    शिखर शैली में निर्मित घृष्णेश्वर मंदिर की भित्तियों पर देवी-देवताओं की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं, और इसका उल्लेख शिव पुराण में भी मिलता है। पारम्परिक मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना अहिल्याबाई होलकर ने कराई थी, और यह अजन्ता एवं एलोरा गुफाओं के समीप स्थित है। मंदिर परिसर अत्यंत भव्य है, जिसमें मनोहर शिल्प, प्रतिमाएँ और अन्य विशेषताएँ सम्मिलित हैं। यह उतना ही चित्ताकर्षक है, और मंदिर की संरचना आपको मुग्ध कर देगी।घृष्णेश्वरशिव पुराण के अनुसार घुष्मा नामक एक स्त्री थी, जिसके पुत्र की हत्या उसकी अपनी बहन ने कर दी थी। शोक में डूबी घुष्मा ने भगवान शिव की प्रार्थना आरम्भ की, और शिव उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे पुत्र-वर का आशीर्वाद देकर पुत्र पुनः लौटा दिया। घुष्मा की प्रार्थना पर भगवान शिव यहाँ घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए विराजमान हो गए।

    घृष्णेश्वर मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

     इस ज्योतिर्लिंग से सम्बन्धित अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। लोक-परम्परा के अनुसार कुसुमा नामक एक स्त्री प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा करती थी और प्रार्थना के साथ शिवलिंग को एक तालाब में विसर्जित करती थी। उसके पति की पहली पत्नी उसके प्रेम से ईर्ष्या करती थी, और इसी कारण उसने कुसुमा के पुत्र की हत्या कर दी। यद्यपि कुसुमा शोक में थी, फिर भी उसने भगवान में अपनी आस्था और भक्ति बनाए रखी। पारम्परिक मान्यता है कि उसकी भक्ति से इतने प्रभावित होकर भगवान शिव ने उसके पुत्र को पुनर्जीवित किया। कुसुमा के अनुरोध पर भगवान शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। एक अन्य परम्परा के अनुसार देवगिरि पर्वतों में ब्रह्मवेत्ता सुधर्म नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ निवास करते थे। दम्पति के संतान न थी, इसलिए सुदेहा ने अपनी बहन घुष्मा का विवाह अपने पति से करा दिया। अपनी बहन के परामर्श पर घुष्मा शिवलिंग बनातीं, उनकी पूजा करतीं और फिर उन्हें समीप के सरोवर में विसर्जित कर देतीं। अंततः उन्हें पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। समय के साथ सुदेहा अपनी बहन से ईर्ष्या करने लगी और उसने घुष्मा के पुत्र की हत्या कर उसे उसी सरोवर में फेंक दिया, जहाँ उसकी बहन लिंग विसर्जित किया करती थी। यद्यपि घुष्मा की पुत्रवधू ने उसे बताया कि सुदेहा ने ही उसके पुत्र की हत्या की है, फिर भी घुष्मा ने भगवान की कृपा पर पूर्ण विश्वास रखते हुए अपने नित्य कर्म जारी रखे। और उनकी आस्था के अनुसार, जब वे लिंग विसर्जन हेतु जा रही थीं, तो उन्होंने अपने पुत्र को अपनी ओर आते देखा। भगवान शिव उनके सम्मुख प्रकट हुए और उन्हें अपनी बहन के दुष्कर्म के विषय में अवगत कराया। घुष्मा ने अपनी बहन के अपराध की क्षमा हेतु भगवान से प्रार्थना की। प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें वरदान दिया। उनकी प्रार्थना पर भगवान घृष्णेश्वर के रूप में ज्योतिर्लिंग बन कर वहीं विराजमान हो गए। जिस सरोवर में घुष्मा शिवलिंग विसर्जित किया करती थीं, उसका नाम शिवालय पड़ गया। 

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    लेखक के बारे में
    Prakhar Porwal
    Prakhar Porwal वैदिक अनुष्ठान सलाहकार, प्रयाग पंडित

    Prakhar Porwal is the founder of Prayag Pandits, a trusted platform for Vedic rituals and ancestral ceremonies. With deep roots in Prayagraj's spiritual traditions, Prakhar has helped over 50,000 families perform sacred rituals including Pind Daan, Shradh, and Asthi Visarjan across India's holiest cities.

    2,263+ परिवारों की सेवा · 2019 से कार्यरत
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