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द्वितीया श्राद्ध 2026 — पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि का विधान | प्रयाग पंडित्स

Kuldeep Shukla · 1 मिनट पढ़ें · समीक्षित May 5, 2026
मुख्य बिंदु
    इस लेख में

    द्वितीया श्राद्ध पितृ पक्ष का दूसरा दिन है, जो वर्ष 2026 में सोमवार, 28 सितंबर को पड़ रहा है। इसे लोक भाषा में दूज श्राद्ध भी कहते हैं। यह दिन उन पूर्वजों को समर्पित है जिनका देहांत किसी भी मास के शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ हो। निर्णय सिन्धु में द्वितीया तिथि के निर्णय और विधान का विशेष वर्णन है, और यही कारण है कि द्वितीया श्राद्ध तिथि-विशेष पितरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

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    द्वितीया श्राद्ध सोमवार, 28 सितंबर 2026 को है। प्रयागराज त्रिवेणी संगम पर अनुभवी पंडितों के साथ अपने पितरों को श्रद्धांजलि अर्पित करें।

    द्वितीया श्राद्ध क्या है?

    द्वितीया (द्वितीया) चन्द्र पक्ष का दूसरा दिन है। पितृ पक्ष में द्वितीया श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए किया जाता है जिनका देहांत किसी भी मास के शुक्ल द्वितीया अथवा कृष्ण द्वितीया को हुआ हो। लोक परंपरा में इसे दूज श्राद्ध कहा जाता है — यही नाम कार्तिक मास में मनाए जाने वाले भाई-दूज से भी जुड़ा है, क्योंकि दोनों ही द्वितीया तिथि को होते हैं।

    यह संयोग केवल कैलेंडर का नहीं है। वैदिक परंपरा में द्वितीया तिथि का संबंध रिश्तों से, विशेष रूप से भाई-बहन तथा माता-पिता और प्रथम संतान के बंधन से, गहराई से जुड़ा है। मत्स्य पुराण द्वितीया श्राद्ध को इन पूर्वजों के लिए विशेष रूप से बताता है:

    • वे पितर जिनकी पारिवारिक रिश्तों के सम्पन्न देखने की अधूरी इच्छा रह गई थी
    • बड़े भाई, चाचा, ताऊ अथवा परिवार के संरक्षक रहे ज्येष्ठ पुरुष
    • वे पूर्वज जिनका देहांत युवावस्था अथवा बाल्यावस्था में हुआ

    द्वितीया श्राद्ध का एक व्यावहारिक आयाम भी है — यह भ्रातृ पक्ष (भाइयों और कुल के पुरुषों की वंशावली) के श्राद्ध का दिन है। बड़े संयुक्त परिवारों में द्वितीया श्राद्ध पर चाचा, ताऊ तथा कुल के अन्य पुरुष पूर्वजों को सीधी पितृ-वंशावली के साथ स्मरण किया जाता है।

    द्वितीया तिथि का निर्णय — शुक्ल और कृष्ण भेद

    द्वितीया श्राद्ध का सबसे महत्वपूर्ण शास्त्रीय बिंदु तिथि-निर्णय है। निर्णय सिन्धु और धर्म सिन्धु दोनों ग्रंथ द्वितीया तिथि के लिए पक्ष-अनुसार स्पष्ट विधान देते हैं:

    • शुक्ल पक्ष में: परविद्धा द्वितीया लें — अर्थात् वह द्वितीया जो अपने आगे की तिथि (तृतीया) से युक्त हो।
    • कृष्ण पक्ष में: यदि द्वितीया तिथि दिन के पूर्वाह्न (पूर्व भाग) में प्रविष्ट हो रही हो, तो पूर्वविद्धा द्वितीया लें (प्रतिपदा से युक्त)। यदि पूर्वाह्न में न हो रही हो, तो परविद्धा द्वितीया ही ग्राह्य है।

    यही कारण है कि द्वितीया श्राद्ध की तिथि किसी वर्ष में अपराह्न से पहले और किसी वर्ष में दोपहर के बाद पड़ सकती है — पंचांग की गणना अनिवार्य है। हमारे पंडित द्वितीया श्राद्ध की वैध मुहूर्त-विंडो की गणना करके आपको अग्रिम सूचना देते हैं।

    द्वितीया श्राद्ध 2026 — तिथि और मुहूर्त

    2026 में आश्विन कृष्ण द्वितीया सोमवार, 28 सितंबर 2026 को है — पितृ पक्ष का दूसरा दिन।

    द्वितीया श्राद्ध 2026 के शुभ मुहूर्त (उत्तर भारत के लिए लगभग):

    • कुतुप मुहूर्त: प्रातः 11:44 — दोपहर 12:31 (सर्वोत्तम पुण्यदायक; प्रथम वरीयता)
    • रोहिण मुहूर्त: दोपहर 12:31 — 1:17 (अति शुभ)
    • अपराह्न काल: दोपहर 1:17 — 3:36 (विस्तृत वैध समय-खंड)

    द्वितीया तिथि 28 सितंबर की प्रातः प्रतिपदा समाप्ति के बाद आरंभ होकर अपराह्न तक प्रवेशित रहेगी, इसलिए 28 सितंबर ही श्राद्ध का सही दिन है। सोमवार पितृ-कार्यों के लिए विशेष रूप से शुभ है — यह चन्द्रमा का दिन है और चन्द्र वैदिक ज्योतिष में पितृ लोक के अधिपति माने गए हैं। सोमवार को द्वितीया श्राद्ध करने से पितर और कर्त्ता के बीच का संबंध और प्रबल होता है।

    प्रयागराज पधारने वाले परिवारों को सलाह है कि कुतुप मुहूर्त से पूर्व स्नान और तैयारी हेतु प्रातः 10:30 तक त्रिवेणी संगम पहुँचें। तिथि एवं मुहूर्त सत्यापन के लिए DrikPanchang पितृ पक्ष कैलेंडर विश्वसनीय संदर्भ है।

    द्वितीया श्राद्ध किन्हें करना चाहिए?

    धर्म सिन्धु के अनुसार द्वितीया श्राद्ध इन परिवारों के लिए विशेष रूप से विहित है:

    • जिनके पितरों का देहांत द्वितीया तिथि को हुआ हो (किसी भी मास की शुक्ल अथवा कृष्ण द्वितीया)
    • जो दिवंगत बड़े भाई, चाचा अथवा ताऊ का स्मरण कर रहे हैं — भ्रातृ-संबंध और चाचा-संबंध द्वितीया तिथि से विशेष रूप से जुड़े हैं
    • जिनके पैतृक पूर्वज युवावस्था अथवा बाल्यावस्था में दिवंगत हुए हैं — द्वितीया श्राद्ध में अल्पायु पितरों के लिए विशेष मंत्र हैं
    • जो सौतेले अथवा गोद लिए सम्बन्धियों का श्राद्ध कर रहे हैं — सौतेले माता-पिता, सौतेले भाई-बहन और गोद लिए स्वर्गीय पारिवारिक सदस्य परम्परानुसार द्वितीया श्राद्ध में सम्मिलित किए जाते हैं

    जिस परिवार में अनेक पुरुष पितर — दादा, परदादा, ताऊ, बड़े भाई — दिवंगत हुए हों, उनके लिए द्वितीया श्राद्ध सामूहिक स्मरण का प्रमुख दिन बन जाता है। विधि की संरचना ऐसी है कि एक के बाद एक अनेक पिंड अर्पित किए जा सकते हैं — प्रत्येक स्मरणीय पितर के लिए एक।

    यदि आपका परिवार पहली बार पितृ पक्ष में श्राद्ध कर रहा है और किसी विशिष्ट पितर की सही तिथि के बारे में अनिश्चित है, तो प्रयाग पंडित्स के विद्वान आचार्य परिवार के पंचांग रिकॉर्ड और उपलब्ध जानकारी के आधार पर सही तिथि निर्धारित करने में सहायता कर सकते हैं।

    द्वितीया श्राद्ध की चरण-दर-चरण विधि

    1. प्रातःकालीन तैयारी

    कर्त्ता 28 सितंबर को सूर्योदय से पूर्व उठकर गंगा जल से स्नान करें और स्वच्छ श्वेत अथवा हल्के रंग के वस्त्र धारण करें। श्राद्ध स्थल को गंगा जल या गोमूत्र मिश्रित जल से शुद्ध किया जाता है — स्थान दक्षिण की ओर ढलान वाला, गोबर से लीपा हुआ हो (निर्णय सिन्धु अनुशंसा)। एक छोटी चौकी पर पितर का चित्र अथवा स्मृति-चिह्न स्थापित करें।

    2. संकल्प — पूर्ण वंशावली के साथ

    पंडितजी संकल्प कराते हैं, जो द्वितीया श्राद्ध में विशेष रूप से विस्तृत होता है क्योंकि इसमें सीधी पितृ-वंशावली के साथ-साथ ज्येष्ठ पुरुष सम्बन्धियों के नाम भी सम्मिलित किए जाते हैं। कर्त्ता प्राचीनावीती (जनेऊ दाहिने कंधे पर) की मुद्रा में, हाथ में कुश लेकर, दक्षिण-मुख होकर बैठें।

    3. नदी पर तर्पण

    त्रिवेणी संगम अथवा किसी पवित्र नदी पर कर्त्ता जल, काले तिल और कुश से तर्पण अर्पित करते हैं। द्वितीया श्राद्ध के तर्पण क्रम में पैतृक वंशावली के साथ भ्रातृ/कुल-वंशावली दोनों के लिए अंजलियाँ दी जाती हैं। पंडितजी प्रत्येक श्रेणी के पितरों के लिए सही मंत्र का मार्गदर्शन करते हैं।

    4. अग्नि में आहुति

    निर्णय सिन्धु तथा शास्त्र निर्देशानुसार ब्राह्मण की अनुमति लेकर सर्वप्रथम अग्नि, सोम और यम के लिए अग्नि में आहुति दी जाती है। यदि पवित्र अग्नि उपलब्ध न हो, तो आहुति ब्राह्मण के हाथ में दी जा सकती है — यह विधि शास्त्र-सम्मत है।

    5. पिंड दान

    द्वितीया श्राद्ध पर अनेक पिंड अर्पित किए जा सकते हैं — प्रत्येक स्मरणीय पितर के लिए एक। पिंड पकाए हुए चावल, तिल, जौ, मधु और घृत से बनते हैं। त्रिवेणी संगम पर पिंड दान करते समय कर्त्ता के पैर नदी में रखे जाते हैं — जल का स्पर्श पितृ लोक तक अर्घ्य पहुँचाने का माध्यम बनता है।

    द्वितीया श्राद्ध पर अनेक पिंड
    यदि आप द्वितीया श्राद्ध पर एक से अधिक पितरों — दादा, बड़े भाई, चाचा — का श्राद्ध कर रहे हैं, तो प्रत्येक के लिए अलग पिंड तैयार करें। गरुड़ पुराण के अनुसार प्रत्येक आत्मा को अपना नामांकित अर्घ्य आवश्यक है। एक संयुक्त पिंड केवल तभी मान्य है जब सभी पितरों के नाम और निधन-तिथियाँ अज्ञात हों।

    6. ब्राह्मण भोज

    द्वितीया श्राद्ध के ब्राह्मण भोज में परंपरागत रूप से चावल, दाल, ऋतुफल-शाक तथा उड़द दाल का व्यंजन (काली दाल) सम्मिलित होता है — द्वितीया तिथि को दिवंगत पितरों के लिए यह विशेष रूप से प्रिय माना गया है। मीठे में खीर परोसी जाती है। ब्राह्मण भोजन गर्म, दूध-दही-घी-मधु युक्त, और मौन-पूर्ण होना चाहिए।

    7. दान-दक्षिणा

    द्वितीया श्राद्ध में कृषि उत्पाद — अनाज, तिल और गुड़ — का दान प्रमुख है। यदि पितर व्यापारी अथवा शिल्पी थे तो उनके पेशे का प्रतीकात्मक उपहार (दर्जी के लिए वस्त्र, विद्वान के लिए पुस्तकें) देना सुंदर व्यक्तिगत स्मरण है। प्रमुख पंडित को नकद दक्षिणा परम्परागत है।

    द्वितीया श्राद्ध की सामग्री

    • गंगा जल अथवा त्रिवेणी जल
    • काले तिल और सफेद तिल
    • कुश घास
    • पकाए हुए चावल, जौ, मधु, गाय का घी (पिंडों के लिए)
    • श्वेत पुष्प, चंदन, धूप, दीप
    • श्वेत वस्त्र (ब्राह्मण को अर्पण हेतु)
    • उड़द दाल, खीर, ऋतुफल (ब्राह्मण भोज)
    • दान सामग्री: अनाज, तिल, गुड़, वस्त्र, दक्षिणा

    हिन्दू शास्त्रों में महत्व

    गरुड़ पुराण (प्रेत खण्ड) में पितृ लोक का वर्णन है — विशेष रूप से वे आत्माएँ जिनका देहांत युवावस्था में हुआ हो (बड़े भाई, चाचा, चचेरे भाई) — वे जीवित परिवार से अधिक स्मरण की अपेक्षा करती हैं। द्वितीया श्राद्ध इन आत्माओं के केंद्रित स्मरण का माध्यम है।

    ब्रह्मवैवर्त पुराण में एक व्यापारी की कथा है जिसका व्यवसाय तीन पीढ़ियों से असफल हो रहा था — कारण था एक बड़े भाई की अधूरी आत्मा जो युवावस्था में देहांत के बाद विस्मृत रह गई थी। जब व्यापारी ने पवित्र संगम पर विधिवत द्वितीया श्राद्ध किया, तो आत्मा तृप्त हुई और एक वर्ष में परिवार की समृद्धि लौट आई।

    यह कथा दर्शाती है कि पितृ ऋण केवल माता-पिता और दादा-दादी तक सीमित नहीं — यह सम्पूर्ण पैतृक वंशावली तक व्याप्त है।

    मनुस्मृति के अनुसार जो व्यक्ति सम तिथियों (द्वितीया, चतुर्थी आदि) पर पितरों का श्राद्ध करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति द्वितीया तिथि पर श्राद्ध करने का फल संतान-प्राप्ति (अपत्य) बताती है।

    द्वितीया श्राद्ध — क्या करें, क्या न करें

    ये करें

    • स्मरण किए जा रहे पितरों की विशिष्ट स्मृतियाँ और गुण याद करें — गरुड़ पुराण कहता है कि सच्चा स्मरण स्वयं एक अर्घ्य है
    • इस दिन पीपल वृक्ष पर जल अर्पित करें — हिन्दू परम्परा में पीपल पितृ आत्माओं का अस्थायी विश्राम-स्थल माना जाता है
    • द्वितीया श्राद्ध के लिए विशेष रूप से ब्राह्मण को श्वेत वस्त्र अथवा श्वेत तिल अर्पित करें
    • दो दीप जलाएं — एक सीधी वंशावली के लिए, एक भ्रातृ-कुल के लिए
    • विधि पूर्ण होने के बाद गरुड़ पुराण अथवा पितृ स्तोत्र का पाठ करें

    ये न करें

    • शोरगुल अथवा अपवित्र स्थान पर श्राद्ध न करें — विधि की केन्द्रित आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए शांत वातावरण आवश्यक है
    • काक-बलि (कौवे को भोजन) न छोड़ें — कई परिवारों में द्वितीया श्राद्ध पर परिवार तभी भोजन करता है जब कौवा अर्घ्य ग्रहण कर ले
    • इस दिन पारिवारिक विवाद अथवा कानूनी मामले प्रारम्भ न करें — पितृ लोक की ऊर्जाएँ सक्रिय हैं और पारिवारिक कलह से दिवंगत आत्माएँ विचलित होती हैं
    • विधि में शीघ्रता न करें — द्वितीया श्राद्ध में अनेक पिंड और विस्तृत वंशावली-संकल्प के कारण पर्याप्त समय आवश्यक है

    उपयुक्त तीर्थ — प्रयागराज त्रिवेणी संगम

    प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर द्वितीया श्राद्ध करना पितर-आत्मा के लिए सर्वाधिक लाभकारी है। तीन पवित्र नदियों का संगम एक ऐसा ऊर्जा-क्षेत्र निर्मित करता है जो अर्घ्य को सीधे पितृ लोक तक प्रबल पुण्य के साथ पहुँचाता है। प्रयाग पंडित्स ने त्रिवेणी संगम पर सैकड़ों द्वितीया श्राद्ध सम्पन्न कराए हैं — विशेष रूप से इस तिथि के लिए आवश्यक विस्तृत वंशावली-मंत्रों के विशेषज्ञ ज्ञान के साथ।

    शास्त्र वर्णन करते हैं कि त्रिवेणी संगम पर सम्पन्न श्राद्ध गया के पिंड दान के समान पुण्यदायी है।

    सर्व पितृ अमावस्या विकल्प

    यदि किसी कारणवश आप 28 सितंबर 2026 को द्वितीया श्राद्ध नहीं कर पाते, तो पितृ पक्ष की अंतिम तिथि — सर्व पितृ अमावस्या (मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026) — पर सम्पूर्ण कुल का संयुक्त श्राद्ध किया जा सकता है। तथापि शास्त्र-सम्मत आदर्श यह है कि तिथि-विशेष पितरों के लिए उन्हीं की तिथि पर श्राद्ध किया जाए।

    प्रयाग पंडित्स के साथ द्वितीया श्राद्ध

    हमारे पंडितजी समारोह के प्रत्येक पहलू का प्रबंधन करते हैं — तर्पण, पिंड दान, ब्राह्मण भोज की व्यवस्था और दान सामग्री — ताकि आप पितरों से जुड़ने के आध्यात्मिक अनुभव पर पूर्ण ध्यान केन्द्रित कर सकें।

    सम्पूर्ण पितृ पक्ष कार्यक्रम और इन विधियों के पूर्ण संदर्भ के लिए हमारी पितृ पक्ष 2026 मार्गदर्शिका पढ़ें। पूर्ववर्ती दिन की विधियाँ प्रतिपदा श्राद्ध लेख में और अगले दिन की विधियाँ तृतीया श्राद्ध लेख में वर्णित हैं।

    संपर्क — प्रयाग पंडित्स | फोन: +91 77540 97777

    पितृ पक्ष 2026

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    द्वितीया श्राद्ध के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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    लेखक के बारे में
    Kuldeep Shukla
    Kuldeep Shukla वैदिक अनुष्ठान सलाहकार, प्रयाग पंडित

    Kuldeep Shukla is a senior Vedic scholar and content writer at Prayag Pandits. With extensive knowledge of Hindu scriptures, Shradh rituals, and pilgrimage traditions, Kuldeep creates authoritative guides on ancestral ceremonies, astrology, and sacred practices.

    2,263+ परिवारों की सेवा · 2019 से कार्यरत
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