नैमिषारण्य को हिन्दू परंपरा का सर्वोच्च तीर्थ क्यों माना जाता है?
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित नैमिषारण्य को हिन्दू शास्त्रों में सबसे पवित्र वन (ब्रह्म-वन) के रूप में पूजनीय माना गया है और परंपरा में इसे कलियुग का सर्वोच्च तीर्थ कहा जाता है। वराह पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, जब सत्ययुग के ऋषियों ने भगवान ब्रह्मा से पूछा कि कलियुग में वे अविच्छिन्न तपस्या के लिए कहाँ जा सकते हैं, तब ब्रह्मा ने अपने मन से एक चक्र (मनोमय चक्र) छोड़ा और कहा कि जहाँ उसका नेमि, यानी बाहरी घेरा, गिरेगा, वही उनके लिए पवित्र भूमि बनेगी। चक्र इसी स्थान पर उतरा, और वहाँ उगे वन का नाम नैमिष-अरण्य पड़ा, अर्थात वह वन जहाँ नेमि गिरा। स्कन्द पुराण नैमिषारण्य को वह स्थान बताता है जहाँ अट्ठासी हजार ऋषि भगवान सूत से पुराणों का कथन सुनने के लिए एकत्रित हुए, जिससे यह पुराण साहित्य का वास्तविक जन्मस्थान बनता है। महाभारत का पाठ भी यहीं हुआ था। नैमिषारण्य के मध्य स्थित चक्र तीर्थ कुंड को वही स्थान माना जाता है जहाँ चक्र गिरा था। यह भूमि इतनी पवित्र है कि पद्म पुराण के अनुसार नैमिषारण्य का मात्र दर्शन 1,000 अश्वमेध यज्ञों का पुण्य देता है।