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Pitrupaksha

पितृ तर्पण मंत्र: अर्थ, तैयारी और पारिवारिक विधि

Prakhar Porwal · 1 मिनट पढ़ें · समीक्षित सितम्बर 9, 2026
मुख्य बिंदु
  • परिचय — पितृ तर्पण मंत्र और पितृपक्ष की महिमा
  • काशी–रामेश्वरम यात्रा और पितृ कर्म
  • पितृपक्ष का स्वरूप और महत्त्व
  • पितृ तर्पण मंत्र — संपूर्ण मंत्र संग्रह और उनके अर्थ
इस लेख में

पितृ पक्ष 2026 में पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर और सर्व पितृ अमावस्या 10 अक्टूबर है। नीचे प्रार्थनाएँ और सामान्य विधि दी गई हैं; अपनी वैदिक शाखा तथा कुल-परंपरा के अनुसार पुरोहित से पाठ, दिशा और अंजलियों का क्रम लें। आत्मिक फल धार्मिक मान्यताएँ हैं।

परिचय — पितृ तर्पण मंत्र और पितृपक्ष की महिमा

पितृपक्ष — जिसे श्राद्ध पक्ष या महालय पक्ष भी कहते हैं — हिंदू पंचांग का वह पवित्र सोलह दिवसीय काल है जो पितरों की शांति और मोक्ष के लिए समर्पित है। पूर्णिमांत पंचांग में आश्विन और अमांत पंचांग में भाद्रपद (सितंबर-अक्टूबर) के कृष्णपक्ष में यह काल आता है। इस अवधि में पितर सूक्ष्म लोक से पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा दिए गए तर्पण, जल तथा पिंड स्वीकार करते हैं। 2026 की श्राद्ध तिथियाँ देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।“पितृपक्ष” शब्द “पितृ” (पूर्वज) और “पक्ष” (पखवाड़े) के योग से बना है। यह काल हमें याद दिलाता है कि जीवित और दिवंगत पीढ़ियों का अटूट सम्बंध है। तर्पण और अन्य अनुष्ठान करके हिंदू पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और परिवार की समृद्धि के लिए उनका आशीर्वाद माँगते हैं।पितृ तर्पण मंत्र — प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर पितरों को जल अर्पणपितृ तर्पण पितृपक्ष का केंद्रीय अनुष्ठान है। इसमें काले तिल, जौ और गंगाजल मिलाकर पितरों को जलांजलि दी जाती है। इस क्रिया के साथ विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है जो पितरों का आह्वान करते हैं और उनसे कल्याण का आशीर्वाद माँगते हैं। मंत्र और विधि क्षेत्र तथा कुलपरंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती हैं, किंतु उद्देश्य एक ही है — पितरों को आत्मिक तृप्ति देना और उनकी सद्गति सुनिश्चित करनापितृपक्ष में तर्पण करना न केवल धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि यह पितृ-ऋण चुकाने का माध्यम भी है। हिंदू मान्यता के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने पूर्वजों का ऋणी होता है — उनसे मिले जीवन, संस्कार और मूल्यों के लिए। यह गाइड आपको पितृ तर्पण मंत्र और उनकी विधि का व्यापक ज्ञान देगी।

पितृपक्ष का स्वरूप और महत्त्व

पितृपक्ष, जिसे श्राद्ध या महालय पक्ष भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग में अत्यंत गहन महत्त्व का काल है। जो परिवार इन परंपराओं से नए परिचित हो रहे हैं, उनके लिए हमारा श्राद्ध का सम्पूर्ण गाइड इसकी शास्त्रीय आधारभूमि, सही विधि और पितरों को अर्पण के महत्त्व को विस्तार से समझाता है। यह सोलह तिथियों का काल पितृ-पूजा और स्मरण को समर्पित है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

हिंदू धर्म में पितृ-पूजा की परंपरा प्राचीन शास्त्रों में निहित है। गरुड़ पुराण — जो परलोक और दिवंगतों के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों का प्रमुख ग्रंथ है — के अनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरों को शांति और मुक्ति प्राप्त होती है। महाभारत में भी इस काल में पितरों को नमन करने का स्पष्ट उल्लेख है। माना जाता है कि भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ के लिए इसी काल में श्राद्ध किया था। इसी परंपरा का पालन कर पितृपक्ष 2026 में करोड़ों हिंदू यह अनुष्ठान करते हैं।

पितृपक्ष की आत्मिक प्रासंगिकता

पितृपक्ष वह अवसर है जब हिंदू अपने पूर्वजों का पितृ-ऋण चुकाते हैं। यह मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति तीन ऋणों में बँधा है — देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण। श्राद्ध और तर्पण द्वारा पितृ-ऋण से मुक्ति मिलती है। इस काल में पितृलोक के द्वार खुले रहते हैं और पितर पृथ्वी पर अपने वंशजों से जल, तिल और पिंड ग्रहण करने आते हैं।तर्पण में जल, काले तिल, जौ और कभी-कभी चावल के पिंड अर्पित किए जाते हैं। यह श्रद्धापूर्वक और भक्तिभाव से किया जाता है ताकि पितरों की आत्मा को तृप्ति मिले और वे परलोक में सुखपूर्वक यात्रा कर सकें।

सामाजिक और पारिवारिक आयाम

आध्यात्मिक महत्त्व के साथ-साथ पितृपक्ष का गहरा सामाजिक आयाम भी है। यह परिवार के सदस्यों को एकत्र करता है, पीढ़ियों के बीच संस्कारों की निरंतरता बनाए रखता है और पूर्वजों की कहानियाँ अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का अवसर देता है। श्राद्ध और तर्पण करना अपनी जड़ों से जुड़े रहने का माध्यम है।प्रयागराज में पिंड दान करता हुआ तीर्थयात्री — तर्पण विधि का एक दृश्यपितृपक्ष हमें जीवन की क्षणभंगुरता और पुण्य जीवन जीने का स्मरण कराता है। इस काल में किए जाने वाले अनुष्ठान परिवार में सुख, समृद्धि और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा का माध्यम माने जाते हैं।संक्षेप में, पितृपक्ष जीवित और दिवंगत दोनों की परस्पर निर्भरता को रेखांकित करता है। यह चिंतन, कृतज्ञता और भक्ति का काल है।

पितृ तर्पण मंत्र — संपूर्ण मंत्र संग्रह और उनके अर्थ

पितृपक्ष में तर्पण के दौरान विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है जिनका गहरा आध्यात्मिक महत्त्व है। ये मंत्र पितरों का आह्वान करते हैं, उन्हें आत्मिक तृप्ति देते हैं और उनका आशीर्वाद माँगते हैं। नीचे मुख्य पितृ तर्पण मंत्र और उनके अर्थ दिए गए हैं।

१. देव तर्पण मंत्र (Deva Tarpan Mantra)

तर्पण की शुरुआत देवताओं को जल अर्पण से होती है। अँगुलियों के अग्रभाग (देव तीर्थ) से पूर्व दिशा में जल दिया जाता है। शास्त्रीय विधि में प्रत्येक देव को अलग-अलग मंत्र से आह्वान किया जाता है — जैसे “ॐ ब्रह्म तृप्यतु”, “ॐ विष्णुस्तृप्यतु”, “ॐ रुद्रस्तृप्यतु” इत्यादि। पारिवारिक पंडित-परंपरा में इन्हें एक सामूहिक वाक्य से संक्षिप्त किया जाता है:
  • संस्कृत (पंडित-परम्परा): “ॐ ब्रह्मादयो देवास्तृप्यन्ताम्।”
  • हिंदी अर्थ: “हे ब्रह्मादि देवताओ, आप तृप्त हों।”
  • ध्यान दें: यह संक्षिप्त रूप पारिवारिक और पंडित परंपरा में प्रचलित है। विस्तृत शास्त्रीय विधि में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि को व्यक्तिगत मंत्रों से तर्पण दिया जाता है।
देव तर्पण में अंजलियों की संख्या और सामग्री अपनी शाखा की विधि से लें; एक-एक अंजलि और तीन बार पाठ को एक ही अनिवार्य नियम न मानें।

२. ऋषि तर्पण मंत्र (Rishi Tarpan Mantra)

देव तर्पण के बाद ऋषि तर्पण किया जाता है। कनिष्ठिका (छोटी अँगुली) के आधार — जिसे प्राजापत्य तीर्थ (या काय तीर्थ) कहते हैं — से उत्तर दिशा में जल अर्पित किया जाता है। शास्त्रीय विधि में मरीचि, अत्रि, भृगु आदि प्रत्येक ऋषि को अलग-अलग मंत्र से तर्पण दिया जाता है। ध्यान दें: सनक, सनंदन, सनातन, कपिल आदि शास्त्रीय रूप से “दिव्य मानुष तर्पण” की श्रेणी में आते हैं, ऋषि तर्पण में नहीं। पारिवारिक पंडित-परंपरा में इन्हें एक संक्षिप्त वाक्य से कहा जाता है:
  • संस्कृत (पंडित-परम्परा): “ऋषि तर्पण के लिए अपने पुरोहित से शाखा के अनुसार नाम और पाठ लें।”
  • हिंदी अर्थ: “ऋषियों की तृप्ति के लिए जल-अर्पण।”
  • ध्यान दें: शास्त्रीय पार्वण-विधि में ऋषि तर्पण के मंत्र व्यक्तिगत होते हैं (जैसे “ॐ मरीचिस्तृप्यताम्”, “ॐ अत्रिस्तृप्यताम्” आदि)।
ऋषि तर्पण में जल में जौ मिलाया जाता है।

३. पितृ तर्पण मंत्र — मुख्य और सबसे महत्त्वपूर्ण (Pitru Tarpan Mantra)

यही पितृपक्ष का केंद्रीय अनुष्ठान है। इसमें अँगूठे और तर्जनी के बीच (पितृ तीर्थ) से दक्षिण दिशा में काले तिल मिले जल की तीन अंजलि दी जाती है। (गरुड़ पुराण और अग्नि पुराण की पितृ-तर्पण परंपरा)
  • आवाहन मंत्र (Avahana Mantra) — तीर्थ-पुरोहितों की पारम्परिक संकल्प-विधि:
    • संस्कृत: “ॐ आगच्छन्तु मे पितरः सर्वे, गृह्णन्तु जलांजलिम्।”
    • अर्थ: “हे मेरे समस्त पितरो, आइए और इस जलांजलि को ग्रहण करें।”
    • ध्यान दें: यह वाक्य तीर्थ-पुरोहितों और पारिवारिक पंडित-परंपरा में व्यापक रूप से प्रचलित है। शास्त्रीय विधि में प्रत्येक पितर का नाम लेकर व्यक्तिगत मंत्र से आह्वान किया जाता है।
  • सामान्य तर्पण मंत्र:
    • संस्कृत: “ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः।”
    • अर्थ: “ॐ, समस्त पितृ देवताओं को नमस्कार।”
  • पितृ मंत्र (तीन बार):
    • संस्कृत: “ॐ सर्वपितृदेवताभ्यो नमः। तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः।”
    • अर्थ: “ॐ, समस्त देवरूप पितरों को नमन। उन्हें स्वधा (श्रद्धा-अर्पण) सहित नमस्कार।” — यह मंत्र तीन बार दोहराएँ।
परिवार मिलकर पितृ तर्पण मंत्र का पाठ कर पवित्र नदी तट पर जलांजलि अर्पित कर रहा है

३-क. वैदिक पितृ स्वधा मंत्र (Yajurveda)

पितृ तर्पण की परंपरा का मूल वेदों में निहित है। शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता 19.36 में पितरों — पिता, पितामह, प्रपितामह — को स्वधा अर्पित करने का प्राचीनतम मंत्र मिलता है:
  • संस्कृत (यजुर्वेद की पितृ-स्वधा परंपरा):
    • पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
      पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
      प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
  • उच्चारण:
    • “Pitribhyah Svadhayibhyah Svadha Namah. Pitamahebhyah Svadhayibhyah Svadha Namah. Prapitamahebhyah Svadhayibhyah Svadha Namah.”
  • हिंदी अर्थ:
    • “हमारे पिता और वरिष्ठों को, जो स्वधा के अधिकारी हैं, उनका नियत भाग अर्पित है। हमारे पितामह को, जो स्वधा के अधिकारी हैं, उनका नियत भाग अर्पित है। हमारे प्रपितामह को, जो स्वधा के अधिकारी हैं, उनका नियत भाग अर्पित है।”
  • स्रोत: यजुर्वेद की पितृ-स्वधा परंपरा (श्रुति — वेद का मूल प्रामाणिक पाठ)। इसी सूत्र का विस्तार अथर्ववेद की पितृ-स्वधा परंपरा में भी मिलता है।
यह वेद-प्रमाणित मंत्र तर्पण के सबसे प्राचीन रूप को दर्शाता है। “स्वधा” शब्द का अर्थ है — पितरों का नियत भाग, जो उन्हें संतृप्त करता है।

४. चतुर्दश यम तर्पण (Chaturdasha Yama Tarpan)

मृत्यु के देवता यमराज के चौदह रूपों को तर्पण देने से पितरों की सुगम यात्रा सुनिश्चित होती है। शास्त्रीय विधि में यम के चौदह नामों से अलग-अलग जल अर्पित किया जाता है — इसे “चतुर्दश यम तर्पण” कहते हैं (Manual of Hindu Funeral and Ancestral Rites)। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके प्रत्येक नाम पर तीन अंजलि दें:
  • चौदह नाम (संस्कृत):
    1. ॐ यमाय नमः
    2. ॐ धर्मराजाय नमः
    3. ॐ मृत्यवे नमः
    4. ॐ अन्तकाय नमः
    5. ॐ वैवस्वताय नमः
    6. ॐ कालाय नमः
    7. ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः
    8. ॐ औदुम्बराय नमः
    9. ॐ दध्नाय नमः
    10. ॐ नीलाय नमः
    11. ॐ परमेष्ठिने नमः
    12. ॐ वृकोदराय नमः
    13. ॐ चित्राय नमः
    14. ॐ चित्रगुप्ताय नमः
  • हिंदी अर्थ: यम के चौदह स्वरूपों को नमन — जिनमें यम, धर्मराज, मृत्यु, अंतक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त सम्मिलित हैं।
  • स्रोत: चतुर्दश यम तर्पण — Manual of Hindu Funeral and Ancestral Rites

५. दिव्य तर्पण मंत्र (Divya Tarpan Mantra)

दिव्य पितरों — जो देवलोक में निवास करते हैं — के लिए यह मंत्र बोला जाता है।
  • संस्कृत: “ॐ दिव्याय पितृगणाय नमः। तृप्यन्ताम् इदं जलं सतिलं सयवं गृह्णन्ताम्।”
  • अर्थ: “ॐ दिव्य पितृगण को नमन। काले तिल और जौ युक्त यह जल ग्रहण करें और तृप्त हों।”

६. देवताओं और पितरों को नमस्कार का श्लोक

देवताओं और पितरों को नमस्कार का यह श्लोक श्राद्ध-प्रयोग में मिलता है; इसे वैदिक गायत्री छंद का मंत्र न समझें। पारवण श्राद्ध प्रयोग में इसका तीन बार पाठ अनिवार्य बताया गया है (Manual of Hindu Funeral and Ancestral Rites)।
  • शास्त्रसम्मत पाठ (पुराण-परम्परा):
    • ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
      नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥
  • उच्चारण:
    • “Om Devatabhyah Pitribhyashcha Mahayogibhya Eva Cha. Namah Svahayai Svadhayai Nityameva Namo Namah.”
  • हिंदी अर्थ:
    • “देवताओं, पितरों और महायोगियों को नमस्कार। स्वाहा और स्वधा को सदा प्रणाम।”
  • स्रोत: पार्वण श्राद्ध प्रयोग परम्परा (Manual of Hindu Funeral and Ancestral Rites); पुराण-आगम परम्परा। (ध्यान दें: इंटरनेट पर “पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी” रूप भी प्रचलित है, किंतु “धारिणी” स्त्रीलिंग होने से पुल्लिंग पितृगण के सन्दर्भ में व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है।)

७. पितृ दोष निवारण मंत्र

पितृ दोष से मुक्ति के लिए शास्त्रीय परंपरा में सर्वश्रेष्ठ उपाय पितृपक्ष में नियमित तर्पण, श्राद्ध और गया में पिंड दान करना है। इसके अतिरिक्त, एक बीजमंत्र-आधारित प्रयोग जो तांत्रिक परंपरा में प्रचलित है:
  • मंत्र (तांत्रिक परंपरा):
    • “पितृ दोष के लिए किसी अप्रमाणित बीजमंत्र को अनिवार्य न मानें; अपने पुरोहित से मान्य पाठ लें।”
  • उच्चारण:
    • “इस अप्रमाणित पाठ का उच्चारण यहाँ निर्धारित नहीं किया गया है।”
  • हिंदी अर्थ:
    • “समस्त पितरों को नमन। पितृ दोष से उत्पन्न सभी कष्ट दूर हों और सुख-शांति प्राप्त हो।”
  • ध्यान दें: पहले दिए गए बीजमंत्र का प्रामाणिक मूल संदर्भ स्पष्ट नहीं है, इसलिए उसका पाठ निर्देशित नहीं किया गया है। वैदिक शास्त्रीय विधि से पितृ दोष निवारण के लिए नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध सर्वाधिक विश्वसनीय उपाय हैं।
स्वास्थ्य, आर्थिक या वैवाहिक कठिनाइयों को पितृ दोष का प्रमाण न समझें। अतिरिक्त धार्मिक कर्म का निर्णय परिवार की परंपरा और स्पष्ट परामर्श से करें।

८. संकल्प मंत्र — तर्पण का आरंभिक वचन

हर तर्पण समारोह संकल्प से आरंभ होता है। कर्ता जल, तिल और दर्भ (कुश) हाथ में लेकर यह मंत्र बोलते हैं:
  • संस्कृत: “ॐ अद्य [तिथि] [नक्षत्र] अस्मत् पितृ पितामह प्रपितामह सपत्नीकानाम् अक्षयतृप्ति-सम्पादनार्थं पितृ तर्पणं करिष्ये।”
  • अर्थ: “आज [तिथि] [नक्षत्र] को मैं अपने पिता, पितामह और प्रपितामह की शाश्वत तृप्ति के लिए यह पितृ तर्पण करता हूँ।”
संकल्प में अपना नाम, गोत्र और जहाँ ज्ञात हो वहाँ पितर के नाम का उल्लेख करें।शास्त्रीय व्यक्तिगत पितृ तर्पण मंत्र: शास्त्रीय परंपरा में प्रत्येक पितर के लिए उनका नाम और गोत्र लेकर अलग-अलग मंत्र बोला जाता है। उदाहरण स्वरूप, पिता के लिए:
  • संस्कृत (Manual of Hindu Funeral and Ancestral Rites):
    • ॐ अद्य अस्मत्पिता [गोत्र] [शर्मा / वर्मा / गुप्त] वसुस्वरूप इदं सतिलं गोपुच्छोदकं
      तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः।
  • हिंदी अर्थ:
    • “आज मेरे पिता [गोत्र] [नाम] जो वसु-स्वरूप हैं, उन्हें यह तिल-जल अर्पित है। उन्हें स्वधा नमस्कार, स्वधा नमस्कार, स्वधा नमस्कार।” (तीन बार बोलकर तीन अंजलि दें।)
  • ध्यान दें: पितामह के लिए “रुद्रस्वरूप” और प्रपितामह के लिए “आदित्यस्वरूप” शब्द प्रयोग होता है।

९. विदाई और धन्यवाद मंत्र

  • संस्कृत: “ॐ पितृदेवताभ्यो नमः।”
  • अर्थ: “ॐ, पितृ देवताओं को नमस्कार।”

तर्पण के लिए तैयारी — सामग्री, समय और स्थान

पितृपक्ष में तर्पण विधि सम्पन्न करने के लिए सावधानीपूर्वक तैयारी आवश्यक है।

आवश्यक सामग्री

तर्पण से पहले निम्नलिखित सामग्री एकत्र करें:
  • आसन/चटाई: बैठने के लिए स्वच्छ कपड़े या कुश का आसन।
  • जल: स्वच्छ जल, यथासम्भव गंगाजल।
  • काले तिल (तिल): पितृ तर्पण का अनिवार्य घटक।
  • जौ (यव): देव और ऋषि तर्पण में प्रयुक्त।
  • चावल के पिंड: कुछ क्षेत्रों में श्राद्ध विधि में इनका प्रयोग होता है।
  • कुश (दर्भ घास): पवित्र मानी जाती है; संकल्प और तर्पण दोनों में काम आती है।
  • चाँदी या ताँबे का पात्र: अर्पण रखने के लिए।
  • दीपक और धूपबत्ती: पवित्र वातावरण बनाने के लिए।

सही समय और स्थान का चयन

  • समय: तर्पण प्रातःकाल किया जाता है। प्रातःकालीन सूर्य अर्पण को पितरों तक पहुँचाने में सहायक माना जाता है।
  • तिथि: पूरे पितृपक्ष में तर्पण किया जा सकता है, किंतु सर्वपितृ अमावस्या (महालय अमावस्या) सबसे महत्त्वपूर्ण दिन है।
  • स्थान: नदी या जलाशय के तट पर करना सर्वोत्तम है। घर पर पूर्व या दक्षिण दिशा में शांत कोने में भी यह विधि की जा सकती है।
वाराणसी में अस्थि विसर्जन विधि — तर्पण विधि का एक प्रमुख चरण वाराणसी (काशी-बनारस) में अस्थि विसर्जन और तर्पण के नियम

अनुष्ठान स्थल की पवित्रता

  • स्वच्छता: स्थान को अच्छी तरह साफ करें। गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
  • वेदी: पितरों के चित्र, दीपक और धूपबत्ती रखें।
  • व्यक्तिगत शुद्धि: स्नान करके श्वेत वस्त्र धारण करें।

पितृ तर्पण की चरण-दर-चरण विधि (Tarpan Vidhi)

पितृपक्ष में तर्पण करने की सम्पूर्ण विधि नीचे दी गई है:

चरण १: स्नान और संकल्प

  1. शुद्धि: स्नान कर स्वच्छ, सफेद वस्त्र पहनें।
  2. सामग्री: आसन, जल, काले तिल, जौ, कुश और दीपक-धूपबत्ती एकत्र करें।

चरण २: अनुष्ठान स्थल की स्थापना

  1. स्थान: पूर्व या दक्षिण दिशा में स्वच्छ स्थान चुनें।
  2. वेदी: पितरों के फोटो या प्रतीक के सामने सामग्री रखें।
  3. पवित्रीकरण: गंगाजल से स्थान को पवित्र करें।

चरण ३: पितरों का आह्वान

  1. आवाहन मंत्र: पितृपक्ष आरंभ के साथ माता-पिता दोनों पक्षों के पितरों को मानसिक रूप से आमंत्रित करें।
    • मंत्र: “ॐ आगच्छन्तु मे पितरः सर्वे, गृह्णन्तु जलांजलिम्।”
    • अर्थ: “हे मेरे समस्त पितरो, आइए और जलांजलि ग्रहण करें।”

चरण ४: जल और तिल का अर्पण

  1. तिल ग्रहण: दाहिने हाथ में थोड़े काले तिल लें।
  2. जल अर्पण: मंत्र बोलते हुए तिल पर जल डालें।
    • तर्पण मंत्र: “ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः।”
प्रयागराज में पिंड दान — तर्पण मंत्र पाठ के साथ जलांजलि अर्पण

चरण ५: तीन तीर्थों (हस्त मुद्राओं) द्वारा जल अर्पण

हिंदू परंपरा में तर्पण के लिए तीन विशेष हाथ की मुद्राएँ निर्धारित हैं:
  1. देव तीर्थ (अँगुलियों के अग्रभाग, पूर्व दिशा) — देवताओं को जल अर्पण।
  2. काय तीर्थ (छोटी अँगुली का आधार, उत्तर दिशा) — जौ-मिश्रित जल से ऋषियों को अर्पण।
  3. पितृ तीर्थ (अँगूठे और तर्जनी के बीच, दक्षिण दिशा) — काले तिल मिले जल से पितरों को अर्पण। पितृपक्ष में यही मुद्रा सबसे महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक पितर के लिए तीन अंजलि दें।

चरण ६: मुख्य पितृ तर्पण मंत्र का पाठ

  1. पितृ-नमस्कार श्लोक:
    • “ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥”
  2. पितृ दोष निवारण मंत्र:
    • “पितृ दोष के लिए किसी अप्रमाणित बीजमंत्र को अनिवार्य न मानें; अपने पुरोहित से मान्य पाठ लें।”
  3. अतिरिक्त तर्पण मंत्र:
    • “ॐ सर्वपितृदेवताभ्यो नमः। तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः।”

चरण ७: अतिरिक्त अर्पण

  1. पिंड: यदि पारिवारिक परंपरा हो तो चावल के पिंड वेदी पर रखें।
  2. कुश: उपलब्ध होने पर कुश घास का उपयोग करें।

चरण ८: समापन और कृतज्ञता

  1. धन्यवाद मंत्र:
    • “ॐ पितृदेवताभ्यो नमः।”
  2. दीप प्रज्वलन: दीपक और अगरबत्ती जलाकर अनुष्ठान समाप्त करें।
  3. गायत्री मंत्र:
    • “ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।”
    • अर्थ: “ॐ, भूमि, अंतरिक्ष और स्वर्ग। हम उस दिव्य सूर्य-प्रकाश का ध्यान करते हैं। वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।”
इन चरणों का पालन कर आप पितृपक्ष में तर्पण को श्रद्धापूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं। पूरी विधि के लिए देखें: तर्पण विधि — सम्पूर्ण चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका

क्षेत्रीय परंपराएँ और विविधताएँ

पितृपक्ष के अनुष्ठान समस्त भारत में मनाए जाते हैं, किंतु क्षेत्रीय रीति-रिवाज इसे विविध और समृद्ध बनाते हैं।

उत्तर भारत

उत्तर भारत में पितृपक्ष मुख्यतः गरुड़ पुराण और मनुस्मृति के आधार पर मनाया जाता है:
  • पिंड अर्पण: पके चावल और जौ के आटे से बने पिंड वैदिक मंत्रों के साथ अर्पित किए जाते हैं।
  • पवित्र नदियाँ: गंगा, यमुना या सरस्वती के तट पर तर्पण करने की परंपरा है।
  • विशेष तिथियाँ: सोलह दिनों में से प्रत्येक दिन किसी विशेष सम्बन्धी के लिए निर्धारित होता है।

दक्षिण भारत

दक्षिण भारत में इसे “महालय अमावस्या” कहते हैं और विस्तृत समारोह आयोजित होते हैं:
  • तिल तर्पणम्: तिल मिश्रित जल से पितरों को तर्पण दिया जाता है।
  • पिंड प्रदानम्: चावल के पिंड के साथ नारियल और फूल भी अर्पित किए जाते हैं।
  • पारिवारिक एकत्रण: परिवार एकसाथ मिलकर अनुष्ठान करता है।
पंडित पितृ तर्पण मंत्र का पाठ कर पितरों को जल अर्पण कर रहे हैं

पश्चिम भारत

महाराष्ट्र और गुजरात में सरलता और भक्ति का मेल देखने को मिलता है:
  • तिलांजलि: तिल मिश्रित जल घर पर या जलाशय के पास अर्पित किया जाता है।
  • सामूहिक भागीदारी: स्थानीय पंडित के नेतृत्व में सामूहिक प्रार्थना और अनुष्ठान होते हैं।
  • भोजन अर्पण: ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को शाकाहारी भोजन दिया जाता है।

पूर्वी भारत

पश्चिम बंगाल और ओडिशा में इसे “महालय पक्ष” कहते हैं:
  • महालय अमावस्या: बंगाल में यह दिन देवी पक्ष और दुर्गापूजा के आगमन का सूचक है।
  • महिषासुर मर्दिनी पाठ: बंगाल में महालय पर देवी दुर्गा के आह्वान की विशेष परंपरा है।
  • पितरों का प्रिय भोजन: पितरों का मनपसंद पारंपरिक भोजन बनाकर जरूरतमंदों में बाँटा जाता है।

विशेष तीर्थस्थल

  • प्रयागराज में तर्पण: त्रिवेणी संगम पर तर्पण और पिंड दान अत्यंत फलदायी माने जाते हैं।
  • गया में पिंड दान: बिहार के गया को पितृ कर्म का सर्वोत्तम स्थान माना जाता है। यहाँ भगवान राम ने स्वयं फल्गु नदी के तट पर राजा दशरथ का श्राद्ध किया था।
  • केरल में ओणम: केरल के कुछ भागों में ओणम उत्सव के दौरान पितरों को अर्पण की परंपरा है।

क्षेत्रीय मान्यताओं का प्रभाव

  • ज्योतिषीय गणना: तमिलनाडु जैसे राज्यों में श्राद्ध के दिन ज्योतिष के आधार पर तय किए जाते हैं।
  • स्थानीय देवता: कुछ क्षेत्रों में स्थानीय देव-देवी भी पितरों और जीवितों के बीच माध्यम के रूप में शामिल किए जाते हैं।

पारिवारिक विशेष परंपराएँ

  • व्यक्तिगत मंत्र: कुछ परिवारों में पितरों के नाम लेकर मंत्र बोले जाते हैं।
  • विशेष अर्पण: पितरों का मनपसंद भोजन या वस्तु अर्पित करना पारिवारिक परंपरा का हिस्सा होता है।
इन क्षेत्रीय विविधताओं को जानने से यह स्पष्ट होता है कि पितृपक्ष की परंपरा कितनी व्यापक और समृद्ध है। प्रत्येक क्षेत्र की विशिष्ट प्रथाएँ इस पर्व को और भी अर्थपूर्ण बनाती हैं।

तर्पण के लाभ — आत्मिक, भावनात्मक और सामाजिक

पितृपक्ष में तर्पण करना धार्मिक कर्तव्य से कहीं अधिक है — इससे पितरों और जीवित वंशजों दोनों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।

पितरों के लिए आत्मिक लाभ

  1. शांति और मोक्ष
    • तर्पण के अनुष्ठान पितरों को आत्मिक तृप्ति देते हैं और उनकी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति में सहायक होते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण पितरों को मोक्ष प्रदान करते हैं।
  2. पापमुक्ति और पितृ दोष निवारण
    • पितृ दोष निवारण मंत्र के पाठ से पितरों के पाप और नकारात्मक कर्म क्षीण होते हैं, जिससे वे अगले जन्म में बिना किसी बोझ के जाते हैं।
तर्पण अनुष्ठान के बाद पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करती भक्त

जीवित वंशजों के लिए लाभ

  1. आशीर्वाद और रक्षा
    • जब पितर तृप्त होते हैं, वे परिवार को सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। हिंदू परंपराओं में पितरों को परिवार का संरक्षक माना जाता है।
  2. पितृ दोष का समाधान
    • पितृ दोष ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यता है; स्वास्थ्य या आर्थिक समस्या का प्रमाणित निदान नहीं। पितृपक्ष में तर्पण इस दोष को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।

भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक लाभ

  1. शोक में सांत्वना और मन की शांति
    • पितरों से संपर्क का यह अवसर भावनात्मक उपचार और शांति देता है। अनुष्ठान में भाग लेने से शोक की प्रक्रिया सरल होती है।
  2. पारिवारिक बंधन की मजबूती
    • पितृपक्ष में परिवार एकत्र होता है, जो पारिवारिक एकता और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक लाभ

  1. परंपराओं का संरक्षण
    • तर्पण करने से परिवार सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को जीवित रखता है।
  2. सामाजिक सद्भाव
    • सामूहिक श्राद्ध समारोह सामाजिक सद्भाव और पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देते हैं।

दैनिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव

  1. आत्मिक जागरूकता
    • पितृपक्ष के अनुष्ठानों में भाग लेने से आत्मिक जागरूकता और सजगता बढ़ती है।
  2. मानसिक शांति
    • पितृ कर्तव्य पूरा करने के बाद मन को तृप्ति और शांति मिलती है।
पितृ तर्पण मंत्र — पंडित नदी तट पर पारंपरिक समारोह में मंत्र पाठ करते हुए

पूछे जाने वाले प्रश्न — पितृ तर्पण मंत्र

पितृपक्ष क्या होता है?

पितृपक्ष हिंदू पंचांग में आश्विन/भाद्रपद के कृष्णपक्ष और पूर्णिमा श्राद्ध से जुड़ी अनुष्ठानिक अवधि हैं जो दिवंगत पितरों की स्मृति और उनके अनुष्ठान को समर्पित हैं। यह वह काल है जब माना जाता है कि पितर सूक्ष्म लोक से पृथ्वी पर आते हैं।

पितृपक्ष क्यों महत्त्वपूर्ण है?

पितृपक्ष पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनका आशीर्वाद माँगने का अवसर है। इस काल में अनुष्ठान करने से पितरों को शांति और मोक्ष मिलता है और परिवार को सुरक्षा प्राप्त होती है।

पितृपक्ष में कौन से मुख्य अनुष्ठान किए जाते हैं?

मुख्य अनुष्ठानों में तर्पण (जल और तिल का अर्पण), पिंड दान (चावल के पिंड का अर्पण) और श्राद्ध (पंडित या परिवार द्वारा विधि) शामिल हैं। ये सभी अनुष्ठान विशेष मंत्रों के साथ किए जाते हैं।

तर्पण के लिए क्या-क्या चाहिए?

तर्पण के लिए चाहिए:
  • बैठने के लिए आसन
  • स्वच्छ जल
  • काले तिल
  • जौ (यव)
  • पिंड (यदि प्रयोग करें)
  • पात्र (थाली या कटोरा)
  • कुश घास
  • दीपक और अगरबत्ती

तर्पण विधि कैसे करें?

तर्पण में काले तिल और जौ मिले जल को मंत्र बोलते हुए पितरों को अर्पित किया जाता है। पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अनुष्ठान किया जाता है। विस्तृत चरण ऊपर दिए गए हैं।

तर्पण के मुख्य मंत्र कौन से हैं?

प्रमुख मंत्र हैं:
  • पितृ-नमस्कार श्लोक: “ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥”
  • पितृ दोष निवारण मंत्र: “पितृ दोष के लिए किसी अप्रमाणित बीजमंत्र को अनिवार्य न मानें; अपने पुरोहित से मान्य पाठ लें।”
  • सामान्य तर्पण मंत्र: “ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः।”

क्या महिलाएँ तर्पण कर सकती हैं?

परंपरागत रूप से यह विधि पुरुष सदस्यों द्वारा की जाती है। किंतु आधुनिक समय में अनेक परिवारों में महिलाएँ भी इसमें भाग लेती हैं। महत्त्वपूर्ण है श्रद्धा और भक्ति, न कि लिंग।

यदि तीर्थ पर जाना संभव न हो तो क्या करें?

यदि गया या किसी पवित्र नदी पर जाना संभव न हो तो घर में या पास के जलाशय पर भी तर्पण किया जा सकता है। शुद्धता और भक्ति ही मुख्य है।

पितृपक्ष में खान-पान के क्या नियम हैं?

अनेक परिवार पितृपक्ष में माँसाहार, प्याज और लहसुन से परहेज करते हैं। सात्त्विक (शुद्ध) भोजन का पालन करें। ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को शाकाहारी भोजन देना भी पुण्य का कार्य है।

यदि पितृपक्ष में तर्पण न हो सके तो क्या करें?

यदि पितृपक्ष में तर्पण संभव न हो तो अमावस्या या पितर की पुण्यतिथि पर किया जा सकता है। परिवार की ओर से पंडित से यह विधि करवाई भी जा सकती है।

उपसंहार — पितृ तर्पण मंत्र की महिमा

पितृपक्ष हिंदू परंपरा की गहरी जड़ों में समाया हुआ एक ऐसा काल है जो जीवित और दिवंगत के बीच अटूट सम्बंध को रेखांकित करता है। सोलह दिनों का यह समय पीढ़ियों की निरंतरता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का साक्षी बनता है।पितृ तर्पण मंत्र के साथ की जाने वाली तर्पण विधि — सामग्री एकत्र करना, पितरों का आह्वान, जल और तिल का अर्पण और मंत्र पाठ — यह सुनिश्चित करती है कि पितरों को आवश्यक आत्मिक तृप्ति मिले। इससे पितरों को मोक्ष और जीवित वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।तर्पण के लाभ बहुआयामी हैं। आत्मिक दृष्टि से पितृ दोष का निवारण होता है। भावनात्मक रूप से शोक में शांति और उपचार मिलता है। सामाजिक दृष्टि से परिवार की एकता और परंपराओं का संरक्षण होता है।उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक, पूर्व से पश्चिम तक — पितृपक्ष की क्षेत्रीय विविधताएँ इस पर्व की व्यापकता और गहराई को दर्शाती हैं। हर क्षेत्र की विशिष्ट प्रथाएँ इस परंपरा को और भी समृद्ध बनाती हैं।पितृपक्ष 2026 — भारत भर में श्राद्ध पखवाड़े में मनाई जाने वाली क्षेत्रीय परंपराएँसंक्षेप में, पितृपक्ष चिंतन, भक्ति और अपनी वंश-परंपरा को सम्मान देने का काल है। शुद्ध मन और सच्चे भाव से इन अनुष्ठानों में भाग लेकर हम सनातन परंपराओं की पवित्रता बनाए रखते हैं। यह मार्गदर्शिका आपको पितृ तर्पण मंत्र और तर्पण विधि का पूर्ण ज्ञान देती है ताकि आप इसे सार्थक और प्रभावी तरीके से सम्पन्न कर सकें।

सम्पूर्ण मार्गदर्शिका पढ़ें: तर्पण विधि — सभी मंत्रों सहित चरण-दर-चरण सम्पूर्ण विधि

तर्पण में तीन तीर्थ (हस्त मुद्राएँ)

हिंदू परंपरा में जल अर्पण के लिए तीन विशेष हस्त मुद्राएँ निर्धारित हैं: देव तीर्थ (अँगुलियों का अग्रभाग, पूर्व दिशा) — देवताओं के लिए; काय तीर्थ (छोटी अँगुली का आधार, उत्तर दिशा) — जौ-मिश्रित जल से ऋषियों के लिए; और पितृ तीर्थ (अँगूठे और तर्जनी के बीच, दक्षिण दिशा) — काले तिल मिले जल से पितरों के लिए। पितृपक्ष के पितृ तर्पण में पितृ तीर्थ मुद्रा सबसे महत्त्वपूर्ण है — प्रत्येक पितर के लिए तीन अंजलि दें।

त्रिनिदाद और टोबैगो के परिवारों के लिए: पितृ पक्ष 2026 त्रिनिदाद और टोबैगो मार्गदर्शिका (अंग्रेज़ी) स्थानीय पंचांग, घर के अनुष्ठान और भारत में पूजा का अंतर तथा उपलब्ध तीर्थ-सेवाएँ समझाती है।

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लेखक के बारे में
Prakhar Porwal
Prakhar Porwal वैदिक अनुष्ठान सलाहकार, प्रयाग पंडित

Prakhar Porwal is the founder of Prayag Pandits, a platform for Vedic rituals and ancestral ceremonies. His work focuses on helping families understand and coordinate Pind Daan, Shradh, and Asthi Visarjan across India's pilgrimage cities.

2,263+ परिवारों की सेवा · 2019 से कार्यरत
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