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Pitrupaksha

प्रतिपदा श्राद्ध — पितृ पक्ष की प्रथम तिथि का विधान

Kuldeep Shukla · 1 मिनट पढ़ें · समीक्षित May 5, 2026
मुख्य बिंदु
    इस लेख में

    प्रतिपदा श्राद्ध पितृ पक्ष की प्रथम तिथि का विशेष कर्म है। इसे केवल उन पूर्वजों के निमित्त किया जाता है जिनका देहावसान प्रतिपदा तिथि को हुआ हो। निर्णय सिन्धु और धर्म सिन्धु में इस तिथि के लिए विशिष्ट विधान वर्णित हैं। प्रयाग पंडित्स के विद्वान आचार्य संगम तट पर शास्त्रोक्त रीति से प्रतिपदा श्राद्ध सम्पन्न कराते हैं।

    प्रतिपदा श्राद्ध क्या है

    हिन्दू पञ्चाङ्ग में पक्ष की प्रथम तिथि को प्रतिपदा कहा जाता है। पितृ पक्ष आरम्भ होते ही भाद्रपद कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि आती है, जिसे महालय का प्रथम दिन माना गया है। शास्त्रों में इस तिथि का श्राद्ध केवल उन पितरों के लिए कहा गया है जिनकी मृत्यु तिथि प्रतिपदा थी। इसके अतिरिक्त आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नाना (मातामह) के श्राद्ध हेतु समर्पित माना गया है, जिसे दौहित्र प्रतिपदा भी कहते हैं।

    प्रतिपदा-तिथि-मृत पूर्वजों के लिए विशेष महत्व

    श्राद्ध-कर्म का मूल सिद्धान्त यही है कि जिस तिथि को पितर का देहावसान हुआ हो, उसी तिथि को पितृ पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाए। प्रतिपदा को मृत्यु प्राप्त पितर के निमित्त परिजन वर्ष-वर्ष पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ही अन्न, जल और पिण्ड का अर्पण करते हैं। यह तिथि-श्राद्ध पितरों को सीधा तृप्ति प्रदान करता है तथा कुल पर पितृ-कृपा बनी रहती है।

    शुक्ल प्रतिपदा बनाम कृष्ण प्रतिपदा का अंतर

    दोनों प्रतिपदाओं का प्रयोजन भिन्न है और शास्त्र इन्हें स्पष्ट रूप से अलग-अलग रखते हैं —

    • कृष्ण प्रतिपदा (पितृ पक्ष का प्रथम दिन): महालय श्राद्ध की पहली तिथि। यह केवल उन पूर्वजों के लिए ग्रहण की जाती है जिनकी मृत्यु तिथि प्रतिपदा थी। सकृन्महालय (एक दिन में सम्पूर्ण पितृ पक्ष का श्राद्ध) के लिए शास्त्र इसे वर्जित मानते हैं क्योंकि यह नन्दा तिथि है।
    • शुक्ल प्रतिपदा (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा): पितृ पक्ष समाप्त होने के तुरंत बाद आने वाली यह तिथि नाना (मातामह) के श्राद्ध को समर्पित है। इसे दौहित्र प्रतिपदा भी कहा जाता है।

    निर्णय सिन्धु और धर्म सिन्धु में प्रतिपदा का विधान

    निर्णय सिन्धु में उल्लिखित है कि सकृन्महालय के लिए नन्दा तिथियाँ — प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी — सामान्य रूप से वर्जित हैं। किन्तु एक विशेष अपवाद भी दिया गया है — यदि किसी पितर की वास्तविक मृत्यु तिथि प्रतिपदा ही हो, तो उस दिन उनका तिथि-श्राद्ध करने पर नन्दा तिथि का यह निषेध लागू नहीं होता। इसलिए प्रतिपदा-तिथि-मृत पूर्वज का श्राद्ध प्रतिपदा को ही करना अनिवार्य माना गया है। धर्म सिन्धु में भी इसी विधान की पुष्टि की गई है।

    दौहित्र प्रतिपदा — नाना का विशेष श्राद्ध

    आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को धर्म सिन्धु एवं हेमाद्रि के सन्दर्भ में नाना (मातामह) के पार्वण श्राद्ध का विधान है। इस दिन के सम्बन्ध में निर्णय सिन्धु स्पष्ट करता है —

    • मामा जीवित होने पर भी दौहित्र (नाती) को नाना का यह श्राद्ध करना चाहिए।
    • नानी जीवित हों तो केवल नाना का पार्वण; दोनों का देहान्त हो चुका हो तो सपत्नीक श्राद्ध।
    • पिता के जीवित होते हुए भी दौहित्र को इस श्राद्ध का अधिकार है।
    • नवजात अथवा अनुपनीत (जिनका जनेऊ संस्कार न हुआ हो) दौहित्र भी अधिकारी हैं।
    • पिण्डदान सपिण्डक या अपिण्डक (केवल संकल्प + ब्राह्मण भोजन-दान) दोनों रूपों में मान्य।

    प्रतिपदा श्राद्ध की विधि — चरण दर चरण

    शास्त्रोक्त प्रतिपदा श्राद्ध पार्वण विधि से सम्पन्न किया जाता है। प्रयाग पंडित्स द्वारा अनुसरित पारम्परिक क्रम इस प्रकार है —

    1. स्नान एवं संकल्प: गंगा-स्नान के पश्चात् यजमान कुश-तिल-जल लेकर प्रतिपदा-तिथि-मृत पितर के निमित्त संकल्प करते हैं।
    2. तर्पण: देव, ऋषि एवं पितृ-तीनों के निमित्त जल-तर्पण। प्रतिपदा-मृत पूर्वज का नाम-गोत्र सहित विशिष्ट तर्पण।
    3. विश्वेदेव-स्थापन: मातामह श्राद्ध में ‘धूरिलोचन’ अथवा मतान्तर से ‘पुरूरवा-आर्द्रव’ विश्वेदेवों का आवाहन।
    4. पिण्डदान: चावल, जौ, तिल मिश्रित पिण्डों का अर्पण; मन्त्र सहित पिण्ड का स्पर्श कराकर अर्पण।
    5. ब्राह्मण भोजन: शास्त्रसम्मत ब्राह्मण को आसन, भोजन, दक्षिणा एवं तिल-जल का दान।
    6. विसर्जन एवं आशीर्वाद: पिण्डों का गाय अथवा गंगा को अर्पण; विश्वेदेव-पितृ विसर्जन; ब्राह्मण आशीर्वाद ग्रहण।

    प्रतिपदा श्राद्ध का काल — अपराह्न-व्यापिनी तिथि

    श्राद्ध-कर्म के लिए शास्त्र अपराह्न-काल (दोपहर के बाद का समय) ग्रहण करते हैं क्योंकि यही पितरों का प्रिय काल है। प्रतिपदा तिथि भी वही ली जाती है जो अपराह्न-व्यापिनी हो — अर्थात् जिस दिन प्रतिपदा अपराह्न-काल में विद्यमान हो। यदि एक ही दिन प्रतिपदा अपराह्न में हो और अगले दिन भी, तो जिस दिन अपराह्न में अधिक काल व्याप्त हो, उसी को ग्रहण करना चाहिए।

    श्राद्ध की सामग्री

    • कुश, काले तिल, जौ, अक्षत (बिना टूटा चावल), यव
    • गंगाजल अथवा शुद्ध जल, तीर्थ-जल
    • दूध, दही, घी, मधु, गुड़ — पञ्चामृत
    • पिण्डदान हेतु पकाया हुआ चावल, जौ का आटा
    • श्राद्ध-भोजन — खीर, पूड़ी, सब्ज़ी, पकवान (पितरों का प्रिय)
    • दर्भ-पवित्री, यज्ञोपवीत, चन्दन, पुष्प, धूप-दीप
    • ब्राह्मण-दक्षिणा एवं वस्त्र

    प्रतिपदा श्राद्ध हेतु उपयुक्त तीर्थ

    शास्त्रों में पितृ-कर्म हेतु तीन क्षेत्र विशेष कहे गए हैं — प्रयागराज (त्रिवेणी संगम), गया (विष्णुपद) और काशी (मणिकर्णिका)। प्रतिपदा-तिथि-मृत पूर्वजों के निमित्त संगम तट पर श्राद्ध करने से तीन गुणा फल बताया गया है। प्रयाग में अक्षयवट, संगम तट और दशाश्वमेध घाट प्रमुख स्थल हैं जहाँ शास्त्रोक्त रीति से यह कर्म सम्पन्न किया जाता है।

    क्या प्रतिपदा का श्राद्ध सर्व पितृ अमावस्या पर किया जा सकता है

    यदि किसी कारणवश प्रतिपदा तिथि को श्राद्ध सम्भव न हो — जैसे प्रवास, अस्वस्थता, अथवा सूतक — तो शास्त्र वैकल्पिक उपाय भी देते हैं। ऐसी स्थिति में सर्व पितृ अमावस्या (महालय अमावस्या) के दिन समस्त पितरों का सम्मिलित श्राद्ध करते हुए प्रतिपदा-तिथि-मृत पूर्वज का भी संकल्प सहित स्मरण किया जा सकता है। तथापि सामर्थ्य होने पर तिथि-विशेष श्राद्ध ही श्रेष्ठ माना गया है।

    प्रयाग पंडित्स द्वारा प्रतिपदा श्राद्ध सेवा

    प्रयाग पंडित्स के अनुभवी आचार्य संगम तट पर शास्त्रोक्त रीति से प्रतिपदा श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान सम्पन्न कराते हैं। प्रत्येक यजमान के गोत्र, तिथि एवं संकल्प के अनुसार पूजा सामग्री व्यवस्थित की जाती है। हमारे पुरोहित निर्णय सिन्धु एवं धर्म सिन्धु के विधानों का पालन करते हुए पिण्डदान विधि का पालन कराते हैं तथा पिण्डदान का सम्पूर्ण ज्ञान सहज भाषा में आपको देते हैं। बुकिंग के लिए सम्पर्क करें — +91 77540 97777

    श्राद्ध-कर्म से जुड़ी अन्य आवश्यक जानकारी हेतु — मृत्यु के बाद ब्राह्मण भोज लेख देखें। संगम तट पर श्राद्ध एवं अन्तिम संस्कार सेवा हेतु हम अस्थि विसर्जन प्रयागराज तथा प्रयागराज पिण्डदान पैकेज भी उपलब्ध कराते हैं। आपातकालीन सेवा एवं पञ्चाङ्ग-शुद्ध मुहूर्त निर्धारण के लिए हमारे आचार्यों से सम्पर्क करें।

    निष्कर्ष

    प्रतिपदा श्राद्ध केवल तिथि-विशेष कर्म नहीं — यह उन पितरों के प्रति विशिष्ट कृतज्ञता है जिनकी मृत्यु प्रतिपदा को हुई। निर्णय सिन्धु एवं धर्म सिन्धु के विधानों का पालन करते हुए सही तिथि, सही काल, सही विधि एवं सही स्थान पर किया गया श्राद्ध पितरों को परम तृप्ति प्रदान करता है। प्रयाग पंडित्स आपके इस सनातन दायित्व को शास्त्रोक्त रीति से पूर्ण कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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    लेखक के बारे में
    Kuldeep Shukla
    Kuldeep Shukla वैदिक अनुष्ठान सलाहकार, प्रयाग पंडित

    Kuldeep Shukla is a senior Vedic scholar and content writer at Prayag Pandits. With extensive knowledge of Hindu scriptures, Shradh rituals, and pilgrimage traditions, Kuldeep creates authoritative guides on ancestral ceremonies, astrology, and sacred practices.

    2,263+ परिवारों की सेवा · 2019 से कार्यरत
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