मुख्य बिंदु
इस लेख में
परिचय — पितृपक्ष 2026 के प्रमुख तीर्थ-स्थल
पितृपक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं, हिन्दू पंचांग में अपने पूर्वजों के स्मरण के लिए समर्पित अत्यन्त पवित्र अवधि है। भाद्रपद के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाले इन सोलह दिनों में परिवार पितरों के सम्मान और तृप्ति हेतु विविध अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं। शास्त्रीय परम्परा में यह माना जाता है कि इस काल में किए गए श्राद्ध-कर्म से दिवंगत आत्माओं को शान्ति मिलती है तथा उनके वंशजों पर पितरों का आशीर्वाद बना रहता है।
पितृपक्ष का महत्त्व पुत्र-धर्म और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा की भावना से जुड़ा है। शास्त्रों के अनुसार, मान्यता है कि अपने तीन पूर्वजवती पीढ़ियों की आत्माएँ पितृलोक में निवास करती हैं — यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का एक लोक है, जिसके अधिपति यमराज माने गए हैं। पितृपक्ष के दौरान इन आत्माओं को पृथ्वी पर लौटकर अपने वंशजों से तर्पण और पिंड ग्रहण करने की अनुमति प्राप्त होती है। इन कर्मों के माध्यम से परिवार पितरों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं और किसी छूटे हुए कर्तव्य के लिए क्षमा-याचना करते हैं।पवित्र तीर्थ-स्थलों पर सम्पन्न पितृपक्ष-अनुष्ठानों का आध्यात्मिक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। भारत में अनेक नगर पितर-पूजा से सम्बद्ध माने गए हैं तथा ये स्थान इन कर्मों के लिए विशेष रूप से शुभ कहे गए हैं। ऐसे स्थल प्राचीन पौराणिक कथाओं से जुड़े हैं और इनकी आध्यात्मिक ऊर्जा पितरों तक अर्पण पहुँचाने में सहायक मानी जाती है। इन तीर्थों पर जाकर पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करने से कर्ता को आत्मिक तृप्ति और मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।इस मार्गदर्शिका में हम 2026 में पितृपक्ष-अनुष्ठान करने हेतु कुछ प्रमुख तीर्थ-स्थलों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। बिहार के प्राचीन नगर गया से लेकर प्रयागराज के पवित्र संगम तक, प्रत्येक स्थल का अपना अद्वितीय धार्मिक महत्त्व है और प्रत्येक पितरों के सम्मान-कर्म हेतु एक गहन अनुभव प्रदान करता है।गया, बिहार
बिहार राज्य में स्थित गया पितृपक्ष-कर्म हेतु सबसे महत्त्वपूर्ण स्थलों में से एक है। यह प्राचीन नगर अत्यन्त धार्मिक महत्त्व रखता है और कई हिन्दू ग्रन्थों में पितर-पूजा हेतु पवित्र स्थल के रूप में वर्णित है।- ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्त्व: मान्यता है कि गया वही स्थल है जहाँ विष्णुपद मन्दिर में भगवान विष्णु के चरण-चिह्न अंकित हैं। पौराणिक परम्परा के अनुसार, नारद पुराण में वर्णन है कि भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ के लिए गया के रुद्रपद पर पिंडदान सम्पन्न किया था। उनके इस आचरण ने हिन्दू-समाज के लिए इस पवित्र स्थल पर पितृ-कर्म की परम्परा स्थापित की।
- प्रमुख अनुष्ठान: पितृपक्ष में गया में सम्पन्न होने वाले प्रमुख कर्म पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध हैं। पिंडदान में पितरों को चावल-तिल-घृत के पिंड अर्पित किए जाते हैं, जिन्हें पितर-आत्माओं की पोषण-तृप्ति का प्रतीक माना गया है। तर्पण में जल के साथ तिल, जौ और कुशा अर्पित कर पितरों की प्यास शान्त की जाती है। श्राद्ध एक व्यापक अनुष्ठान है जिसमें विविध अर्पण और प्रार्थनाओं द्वारा पितरों का सम्मान किया जाता है।

प्रमुख स्थल:
- विष्णुपद मन्दिर: यह मन्दिर गया में पितृपक्ष-कर्मों का केन्द्र है। मन्दिर में भगवान विष्णु का चरण-चिह्न प्रतिष्ठित है और श्रद्धालु मानते हैं कि यहाँ पिंडदान करने से उनके पितरों की आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है।
- फल्गु नदी: फल्गु नदी, जिसे निरंजना नदी भी कहा जाता है, गया से होकर बहती है तथा पवित्र मानी जाती है। तीर्थयात्री इसी नदी के तट पर अनेक कर्म सम्पन्न करते हैं। स्थल-परम्परा के अनुसार यहाँ अर्पित पिंड-जल पितरों तक सीधे पहुँचते हैं।
- अक्षयवट: विष्णुपद मन्दिर के निकट स्थित यह पवित्र वट-वृक्ष है, जहाँ श्रद्धालु पितरों के अक्षय आशीर्वाद हेतु अनुष्ठान करते हैं। विष्णु-संहिता एवं वायु पुराण के अनुसार गया का अक्षयवट पिंडदान का शास्त्र-सम्मत स्थल है।
वाराणसी, उत्तर प्रदेश
वाराणसी, जिसे काशी या बनारस भी कहा जाता है, विश्व के सर्वाधिक प्राचीन जीवित नगरों में से एक है तथा हिन्दू अध्यात्म में अग्रणी स्थान रखती है। पवित्र गंगा के तट पर बसी यह नगरी भारत की आध्यात्मिक राजधानी मानी गई है। पारम्परिक मान्यता के अनुसार वाराणसी में किए गए कर्म आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्रदान करने में सहायक होते हैं।- हिन्दू-धर्म में आध्यात्मिक महत्त्व: वाराणसी भगवान शिव और देवी पार्वती का निवास-स्थान मानी गई है। यह नगर अनेक हिन्दू ग्रन्थों और महाकाव्यों में वर्णित है। पौराणिक परम्परा के अनुसार स्वयं महादेव यहाँ देहत्याग करने वाले प्राणियों के कानों में तारक-मन्त्र देते हैं, जिससे उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।
- गंगा-तट पर अनुष्ठान: वाराणसी के घाट विशेषकर पितृपक्ष में धार्मिक गतिविधियों के केन्द्र बन जाते हैं। गंगा-तट पर पिंडदान, तर्पण और अन्य श्राद्ध-कर्म अत्यन्त शुभ माने गए हैं। माँ गंगा के रूप में पूज्य यह नदी अर्पण को पवित्र कर सीधे पितरों तक पहुँचाने वाली मानी गई है।

प्रमुख स्थल:
- काशी विश्वनाथ मन्दिर: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है तथा प्रमुख तीर्थ है। श्रद्धालु मानते हैं कि पितृपक्ष में यहाँ की गई प्रार्थना से पितरों को शान्ति प्राप्त होती है।
- मणिकर्णिका घाट: यह वाराणसी के सर्वाधिक पवित्र दाह-स्थलों में से एक है। यहाँ अस्थि-विसर्जन और पिंडदान सहित किए गए कर्म दिवंगत आत्माओं को मुक्ति प्रदान करने वाले माने गए हैं।
- दशाश्वमेध घाट: सायंकालीन गंगा आरती के लिए विख्यात यह घाट एक आध्यात्मिक केन्द्र है, जहाँ अनेक श्रद्धालु पितृपक्ष में श्राद्ध-कर्म सम्पन्न करते हैं। यहाँ की आरती स्वयं एक मनोहर दृश्य है जो श्रद्धालुओं और यात्रियों दोनों को आकर्षित करती है।
हरिद्वार, उत्तराखण्ड
हिन्दू-धर्म की सात मोक्षदायिनी पुरियों में से एक हरिद्वार पितृपक्ष-अनुष्ठानों हेतु एक प्रमुख गन्तव्य है। पवित्र गंगा-तट पर स्थित हरिद्वार उत्तराखण्ड के चार धाम का प्रवेश-द्वार है तथा अनेक हिन्दू कर्म-काण्डों के लिए महत्त्वपूर्ण स्थल माना गया है।- हिन्दू कर्म-काण्ड एवं उत्सवों में भूमिका: “हरिद्वार” का अर्थ है “हरि का द्वार” — यह नगर गहरे धार्मिक महत्त्व से ओतप्रोत है। प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख है तथा पितर-पूजा सम्बन्धी कर्मों के लिए यह विशेष रूप से प्रसिद्ध है। प्रत्येक बारह वर्ष में यहाँ कुम्भ मेले का आयोजन होता है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं।
- हर की पौड़ी पर अनुष्ठान: “हर की पौड़ी” अर्थात “भगवान शिव की सीढ़ियाँ” हरिद्वार का सर्वाधिक प्रसिद्ध घाट है। मान्यता है कि यहीं से गंगा पर्वतों से निकलकर मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है। यह घाट पितृपक्ष-कर्मों के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है। श्रद्धालु यहाँ पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध सम्पन्न करते हैं — स्थल-परम्परा के अनुसार गंगा का पवित्र जल इन अर्पणों को पितरों तक पहुँचाकर उनकी आत्मा को मुक्ति प्रदान करता है। हर की पौड़ी की सायं-गंगा-आरती एक भव्य अनुष्ठान है जिसमें पुजारीगण समवेत स्वर में नदी की पूजा करते हैं।

प्रमुख स्थल:
- चण्डी देवी मन्दिर: गंगा के पूर्वी तट पर नील पर्वत पर स्थित यह मन्दिर देवी चण्डी को समर्पित है। मान्यता है कि इस मन्दिर के दर्शन से पितरों की शान्ति हेतु देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- मनसा देवी मन्दिर: बिल्व पर्वत पर स्थित यह मन्दिर देवी मनसा को समर्पित है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि देवी इच्छित मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं तथा पितृपक्ष में दर्शन से जीवित और दिवंगत दोनों के लिए आशीर्वाद मिलता है।
- कनखल: हरिद्वार के निकट स्थित यह छोटा कस्बा दक्ष महादेव मन्दिर का स्थल है तथा पितर-कर्मों हेतु एक और महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। पौराणिक परम्परा के अनुसार देवी सती के पिता राजा दक्ष प्रजापति ने यहीं यज्ञ सम्पन्न किया था, जिससे यह स्थल पिंडदान और श्राद्ध हेतु विशेष महत्त्व रखता है।
प्रयागराज (इलाहाबाद), उत्तर प्रदेश
प्रयागराज, जिसे ऐतिहासिक रूप से इलाहाबाद कहा जाता था, उत्तर प्रदेश में स्थित अत्यन्त धार्मिक महत्त्व वाला नगर है। यह तीन नदियों — गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती — के पवित्र त्रिवेणी संगम के लिए विख्यात है। यह संगम पितृपक्ष-कर्मों हेतु एक प्रमुख तीर्थ-स्थल माना गया है।- गंगा, यमुना एवं सरस्वती का संगम: त्रिवेणी संगम वह स्थल है जहाँ तीन पवित्र नदियों का सम्मिलन होता है, जिससे एक विशिष्ट आध्यात्मिक वातावरण निर्मित होता है। मान्यता है कि सरस्वती अदृश्य रूप से सतह के नीचे प्रवाहित होती हुई इसी बिन्दु पर गंगा-यमुना से मिलती है। यह सम्मिलन भौतिक और आध्यात्मिक तत्त्वों के एकीकरण का प्रतीक है, जो इसे पितर-पूजा हेतु आदर्श बनाता है।
- संगम का पितृपक्ष-महत्त्व: संगम विशेषकर पितृपक्ष में विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि स्थल-परम्परा के अनुसार यहाँ अर्पित कर्म पितरों को सीधे प्राप्त होते हैं। संगम पर पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध सम्पन्न करना पितरों के पापों के शमन और शान्ति-प्राप्ति का साधन माना गया है। गंगा और यमुना का जल अपनी पावन शुद्धि-शक्ति के लिए पूजनीय है, जो यहाँ किए गए कर्मों के प्रभाव को बढ़ाने वाला कहा गया है।

प्रमुख स्थल:
- त्रिवेणी संगम: कर्म-सम्पादन का प्रमुख स्थल यह संगम पितृपक्ष में अत्यन्त व्यस्त रहता है। देश भर से तीर्थयात्री यहाँ एकत्रित होकर अपने पितरों के लिए पिंड (चावल के गोले) अर्पित करते हैं और तर्पण (जल-अर्पण) सम्पन्न करते हैं। संगम का शान्त एवं आध्यात्मिक रूप से ओतप्रोत वातावरण इन कर्मों हेतु उत्तम स्थान प्रदान करता है।
- इलाहाबाद किला: सम्राट अकबर द्वारा निर्मित यह किला संगम के निकट है तथा इसमें प्राचीन पातालपुरी मन्दिर और अक्षयवट के नाम से प्रसिद्ध अमर वट-वृक्ष स्थित है। किले का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्त्व प्रयागराज के आध्यात्मिक वातावरण को और समृद्ध करता है।
- आनन्द भवन: यद्यपि यह सीधे पितृपक्ष-कर्मों से सम्बद्ध नहीं है, आनन्द भवन प्रयागराज का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। यह नेहरू-गांधी परिवार का पैतृक निवास था और अब एक संग्रहालय के रूप में भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम की विरासत प्रस्तुत करता है। इस स्थल के दर्शन से नगर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की गहरी समझ मिलती है।
रामेश्वरम, तमिलनाडु
तमिलनाडु का छोटा द्वीप-नगर रामेश्वरम भारत के सर्वाधिक पवित्र तीर्थ-स्थलों में से एक है। यह मन्नार की खाड़ी में, भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिणी छोर पर स्थित है। चार धाम तीर्थयात्रा का अंग होने के कारण यह नगर पितृपक्ष-कर्मों हेतु अत्यन्त महत्त्व रखता है तथा इसका रामायण से गहरा सम्बन्ध है।- दक्षिणी तीर्थ-स्थल: रामेश्वरम भगवान राम से अपने सम्बन्ध के लिए विख्यात है। पौराणिक परम्परा के अनुसार रावण के बन्दीगृह से माता सीता को मुक्त कराने हेतु भगवान राम ने यहीं से लंका तक राम-सेतु का निर्माण किया था। यह ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्त्व रामेश्वरम को हिन्दुओं के लिए पवित्र बनाता है तथा विश्व-भर के तीर्थयात्री यहाँ आकर्षित होते हैं।
- अग्नि तीर्थम् एवं रामनाथस्वामी मन्दिर पर अनुष्ठान:
- अग्नि तीर्थम्: रामेश्वरम के 64 पवित्र तीर्थों में से एक यह तीर्थ रामनाथस्वामी मन्दिर के सम्मुख स्थित है। श्रद्धालु किसी भी कर्म-सम्पादन से पूर्व अग्नि तीर्थम् में पवित्र स्नान करते हैं — मान्यता है कि इससे पाप-शुद्धि होती है। पितृपक्ष में यहाँ तर्पण और पिंडदान करना अत्यन्त शुभ माना गया है, क्योंकि स्थल-परम्परा के अनुसार पवित्र जल अर्पण को सीधे पितरों तक पहुँचाते हैं।
- रामनाथस्वामी मन्दिर: यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है तथा द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है। पौराणिक परम्परा के अनुसार भगवान राम ने रावण-वध के पाप से मुक्ति हेतु यहीं भगवान शिव की पूजा की थी, क्योंकि रावण ब्राह्मण था। मन्दिर की उत्कृष्ट शिल्पकला और आध्यात्मिक वातावरण इसे श्राद्ध-कर्मों हेतु महत्त्वपूर्ण स्थल बनाते हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मन्दिर परिसर में पिंडदान और अन्य कर्म-सम्पादन से पितरों की आत्मा को शान्ति और मुक्ति प्राप्त होती है।
- रामायण में महत्त्व: रामायण में रामेश्वरम का स्थान इसके आध्यात्मिक महत्त्व को और बढ़ाता है। पौराणिक परम्परा के अनुसार रावण-विजय के पश्चात् भगवान राम ने युद्ध के समय हुए पापों के प्रायश्चित-स्वरूप विशेष कर्म सम्पन्न किए थे, जिनमें रावण-वध भी सम्मिलित है। यह प्रायश्चित-कर्म हिन्दू धर्म का अनिवार्य पक्ष है, जो पितर-पूजा और अपने कर्मों के लिए क्षमा-याचना के महत्त्व को रेखांकित करता है।
रामेश्वरम का समृद्ध पौराणिक इतिहास, पवित्र मन्दिर और शान्त अग्नि तीर्थम् इसे पितृपक्ष-कर्मों हेतु एक प्रमुख गन्तव्य बनाते हैं। नगर का शान्त वातावरण और धार्मिक महत्त्व पितरों के सम्मान-कर्म में संलग्न श्रद्धालुओं को एक गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करते हैं।उज्जैन, मध्य प्रदेश
मध्य भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित उज्जैन हिन्दू-धर्म की सात पवित्र पुरियों में से एक है तथा पौराणिक परम्परा और अध्यात्म में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह प्राचीन नगर अपने ऐतिहासिक मन्दिरों और विविध धार्मिक कर्म-काण्डों एवं उत्सवों से जुड़े होने के कारण विख्यात है।- सात पवित्र पुरियों में से एक: उज्जैन भारत की सर्वाधिक पवित्र नगरियों में से एक है तथा सप्त पुरी तीर्थ-यात्रा का अंग है। नगर का आध्यात्मिक महत्त्व प्राचीन काल से चला आ रहा है और यह अनेक हिन्दू ग्रन्थों में वर्णित है। पौराणिक परम्परा के अनुसार उज्जैन वही नगर है जहाँ भगवान कृष्ण ने गुरु सान्दीपनि के मार्गदर्शन में अध्ययन किया था।
- शिप्रा नदी पर अनुष्ठान: उज्जैन से होकर बहने वाली शिप्रा नदी पवित्र मानी गई है तथा पितृपक्ष-कर्मों हेतु प्रमुख स्थल है। पितृपक्ष के दौरान तीर्थयात्री शिप्रा-तट पर एकत्रित होकर पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध सम्पन्न करते हैं। स्थल-परम्परा के अनुसार शिप्रा का पवित्र जल इन अर्पणों को पितरों तक पहुँचाकर उन्हें शान्ति और मुक्ति प्रदान करता है।

प्रमुख स्थल:
- महाकालेश्वर मन्दिर: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। मन्दिर अपनी भस्म-आरती के लिए विख्यात है, जिसमें भगवान शिव का पावन भस्म से अभिषेक किया जाता है। महाकालेश्वर मन्दिर में पितृपक्ष-कर्म-सम्पादन अत्यन्त शुभ माना गया है — मान्यता है कि स्वयं महादेव दिवंगत आत्माओं को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
- हरसिद्धि मन्दिर: यह मन्दिर देवी पार्वती के अवतार देवी हरसिद्धि को समर्पित है। मन्दिर की महिमा इसकी सशक्त आध्यात्मिक ऊर्जा में है — स्थल-परम्परा के अनुसार यहाँ किए गए कर्म पितरों की शान्ति हेतु देवी के आशीर्वाद की प्राप्ति में सहायक होते हैं।
- काल भैरव मन्दिर: यह मन्दिर भगवान शिव के उग्र रूप काल भैरव को समर्पित है। पारम्परिक मान्यता है कि श्रद्धालु यहाँ देवता को मदिरा अर्पित करते हैं तथा काल भैरव नगर और उसके निवासियों की रक्षा करते हैं। यहाँ श्राद्ध-कर्म पूर्व-कृत पापों की क्षमा और पितरों की आत्मा के कल्याण हेतु लाभकारी कहे गए हैं।
निष्कर्ष — पितृपक्ष 2026 के प्रमुख तीर्थ-स्थल
पितृपक्ष 2026 के इन पवित्र तीर्थ-स्थलों की यात्रा हिन्दू-संस्कृति में भूगोल, अध्यात्म और पितर-श्रद्धा के गहरे सम्बन्ध को रेखांकित करती है। गया, वाराणसी, हरिद्वार, प्रयागराज, रामेश्वरम और उज्जैन — इनमें से प्रत्येक नगर अपनी सदियों पुरानी धार्मिक परम्परा से समृद्ध एक विशिष्ट आध्यात्मिक वातावरण प्रस्तुत करता है। इन स्थलों पर सम्पन्न पितृपक्ष-कर्मों से श्रद्धालु न केवल अपने पितरों का सम्मान करते हैं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक अनुभव में सम्मिलित भी होते हैं।- गया अपने प्राचीन विष्णुपद मन्दिर और पवित्र फल्गु नदी के साथ पिंडदान हेतु एक अद्वितीय गन्तव्य है।
- वाराणसी, अपनी पवित्र गंगा नदी और प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मन्दिर के साथ, दिवंगत आत्माओं की मुक्ति हेतु अनुष्ठानों के लिए एक शक्तिशाली स्थल प्रदान करती है।
- हरिद्वार हर की पौड़ी पर गंगा का पावन जल प्रदान करता है, जहाँ कर्म एक जीवन्त धार्मिक वातावरण में सम्पन्न होते हैं।
- प्रयागराज त्रिवेणी संगम का स्थल है — यह सम्मिलन अत्यधिक आध्यात्मिक महत्त्व रखता है तथा पितर-कर्मों हेतु आदर्श है।
- रामेश्वरम अग्नि तीर्थम् का शान्त जल और रामायण से गहराई से जुड़े रामनाथस्वामी मन्दिर की दिव्यता प्रस्तुत करता है।
- उज्जैन पवित्र शिप्रा नदी और पूज्य महाकालेश्वर मन्दिर से समृद्ध है, जो इसे पितरों के सम्मान हेतु एक प्रमुख स्थल बनाते हैं।
जैसे ही आप पितृपक्ष 2026 की अपनी यात्रा की योजना बनाते हैं, यह स्मरण रखें कि इन कर्मों का आध्यात्मिक महत्त्व स्थल की पवित्रता से कई गुना बढ़ जाता है। इन तीर्थ-स्थलों तक पहुँचकर श्रद्धा और निष्ठा के साथ कर्म-सम्पादन एक गहन आत्मिक तृप्ति प्रदान करने वाला अनुभव सिद्ध होता है।यदि आप इन प्रमुख तीर्थ-स्थलों पर पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण जैसे पितृपक्ष-कर्म सम्पन्न कराना चाहते हैं, तो Prayag Pandits की सेवाओं का लाभ उठाएँ। हम पूर्ण आदर और प्रामाणिकता के साथ कर्म-सम्पादन सुनिश्चित करने वाली व्यापक पूजन सेवाएँ प्रदान करते हैं। अपनी विशेषज्ञता और परम्परा के प्रति प्रतिबद्धता के साथ, Prayag Pandits इन प्राचीन कर्म-काण्डों की सूक्ष्मताओं को समझने और आपकी आध्यात्मिक यात्रा को सरल एवं सार्थक बनाने में सहायक हो सकते हैं। आप हमारी वेबसाइट पर पधार कर सेवाएँ बुक कर सकते हैं और पितृपक्ष 2026 में अपने पितरों के सम्मान-कर्म की एक सार्थक यात्रा पर निकल सकते हैं।
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