जन्म-कुंडली में पितृ दोष की पहचान कैसे होती है?
वैदिक ज्योतिष में पितृ दोष की पहचान मुख्यतः तब होती है, जब जन्म-कुंडली के नवम भाव (पितृ और भाग्य का भाव) में राहु या केतु सूर्य के साथ युति बनाएँ। सूर्य-राहु युति यहाँ सबसे प्रबल संकेतक मानी जाती है। इन ग्रहों के साथ शनि का नवम भाव में स्थित होना या उस पर दृष्टि डालना दोष की तीव्रता को और बढ़ा देता है। कुछ परंपराओं में नवम भाव में चंद्र-राहु युति और नवमेश की पीड़ा को भी देखा जाता है। किसी योग्य ज्योतिषी द्वारा पूरी कुंडली का विश्लेषण करने के बाद ही पितृ दोष की पुष्टि होती है, क्योंकि अन्य भावों के ग्रह इसकी गंभीरता को बदल सकते हैं।
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