मुख्य बिंदु
इस लेख में
कुछ आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार हमारे शरीर में एक ऊर्जात्मक तंत्र है जिसे चक्र कहा जाता है। चक्र संस्कृत शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है “पहिया” या “चक्रीय गति”। मूलाधार चक्र वही स्थान है जहाँ सबसे विराट ऊर्जा कुण्डलिनी पहली बार जागृत होती है। यह बिंदु सिर के श्वेत बिंदु तक उठता हुआ माना जाता है। मूलाधार चक्र में असंतुलन अनेक मानसिक रोगों और तनाव का कारण बन सकता है।सात सूँडों वाला हाथी मूलाधार चक्र का प्रमुख प्रतीकात्मक पशु है। मंत्र और साधना (ध्यान-अभ्यास) — ये दो अंकुश हैं जिनसे इस हाथी को वश में किया जा सकता है। अपने चक्रों की पहचान कर उन पर कार्य करने से शीघ्र चिकित्सा सम्भव है। मूलाधार चक्र को खोलने के अनेक उपाय हैं। ज़मीन से जुड़ाव पर केंद्रित ध्यान उन्हीं विधियों में से एक है।नियमित योगाभ्यास शरीर की शारीरिक एवं मानसिक शक्ति को बढ़ाता है। वीरभद्रासन एक उत्तम मुद्रा है जो व्यग्र मन को शांत और केंद्रित करती है। अर्ध सेतु बंधासन कण्ठ और हृदय चक्रों को सक्रिय करते हुए मूलाधार चक्र की अतिरिक्त ऊर्जा को मुक्त करता है। सुख हनुमानासन (सरल हनुमानासन) पसोआस और जाँघ की माँसपेशियों को गहराई से खींचता है। ताड़ासन हमें संतुलित और शिथिल कर केंद्रित और एकाग्र अनुभव कराता है।एक स्वस्थ और संतुलित मूलाधार चक्र हमारी पार्थिव प्रवृत्तियों से गहरा संपर्क बनाता है। मूलाधार चक्र की ऊर्जा प्रत्येक व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में शक्ति और दृढ़ता जुटाने का सामर्थ्य देती है।
चक्र क्या हैं?
कुछ आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार हमारा शरीर केवल भौतिक और मानसिक ही नहीं; इसमें एक ऊर्जात्मक तंत्र भी विद्यमान है जिसे चक्र कहा जाता है। चक्र संस्कृत शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है “पहिया” या “चक्रीय गति”।रीढ़ की हड्डी की पूरी लम्बाई में, मूलाधार से लेकर सिर के सहस्रार तक, सात प्रमुख चक्र होते हैं। यह प्राचीन अवधारणा अनेक नवीन-युग विचारधाराओं में भी समाहित हो चुकी है।चक्र उस सूक्ष्म ऊर्जा का स्रोत माने जाते हैं जो आपके अंगों, मन और बुद्धि के सम्यक् संचालन में सहायक होती है। आधुनिक चिकित्सा-शोध में चक्रों और आध्यात्मिक ऊर्जा का सूक्ष्म अध्ययन भले ही न हुआ हो, फिर भी किसी भी आस्था या परम्परा की भाँति ये आपको अपने मन और शरीर पर चिंतन करने में सहायता दे सकते हैं।मूलाधार चक्र (Root Chakra) का परिचय
हमारी रीढ़ के निचले छोर — कोक्सिक्स (पूँछ की हड्डी) के आसपास स्थित ऊर्जा-संचारकों में से एक है मूलाधार चक्र। आधुनिक भाषा में इसे “रूट चक्र” कहा जाता है क्योंकि यह रीढ़ के मूल पर स्थित है और हमारी आध्यात्मिक प्रगति की नींव बनता है।रूट चक्र को प्रायः “ऊर्जा-शरीर का आधार” कहा जाता है। यह वही स्थल है जहाँ सबसे विराट ऊर्जा कुण्डलिनी पहली बार जागृत होती है। इसे “लाल बिंदु का आसन” अथवा “सूक्ष्म स्थान” भी कहा गया है। यह बिंदु ऊपर उठते हुए सिर के श्वेत बिंदु तक पहुँचता है, जो शक्ति और शिव — स्त्री और पुरुष ऊर्जाओं के मिलन का प्रतीक है।मूलाधार चक्र की विशेषताएँ
- पृथ्वी तत्त्व
- लाल रंग की तीव्रता
- मूलाधार चक्र का भौतिक केंद्र
- मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य
रूट चक्र का प्रमुख प्रतीकात्मक पशु
सात सूँडों वाला हाथी रूट चक्र का प्रमुख प्रतीकात्मक पशु है। हाथी बुद्धि और समृद्धि का प्रतीक है, और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा (जो सृजन और ज्ञान के अधिष्ठाता हैं) का वाहक भी।हाथी उस विराट प्रज्ञा का प्रतीक है जो रूट चक्र में सुप्त अवस्था में रहती है और जिसे चेतना के प्रकाश में लाना आवश्यक है।हिन्दू परंपरा में सात की संख्या शुभ मानी जाती है। हाथी की सात सूँडें सात शारीरिक तत्त्वों, सात धातुओं, सात रत्नों और चेतना के सात स्तरों का प्रतीक हैं। स्वप्न में स्वयं को हाथी पर — विशेषतः श्वेत हाथी पर — सवार देखना शुभ शकुन माना जाता है।विशाल और बलशाली हाथी को नियंत्रित करने के लिए एक छोटा-सा अंकुश ही पर्याप्त होता है।जंगली हाथी की तुलना प्रायः मन और इन्द्रियों से की जाती है, जो निरंतर परिवर्तनशील हैं और मनुष्य को कुमार्ग की ओर आकर्षित करती हैं। मंत्र (मनोहारी ध्वनि) और साधना (ध्यान-अभ्यास) — ये दो अंकुश हैं जिनसे इस हाथी (अर्थात् मन) को अनुशासित किया जा सकता है।मूलाधार चक्र अवरुद्ध होने के लक्षण
जब मूलाधार चक्र अवरुद्ध या असंतुलित हो जाता है, तो उसका मानसिक तनाव शारीरिक रूप से प्रकट होने लगता है। मूलाधार चक्र के असंतुलन के लक्षण ये हैं:- निराशा या सुस्ती की अनुभूति
- कार्य करने या संकल्प व्यक्त करने में असमर्थता
- अकेलेपन और कटाव का अनुभव
- घबराहट या पैनिक अटैक
- पाचन तंत्र से जुड़े विकार
- बड़ी आँत, मूत्राशय और कमर के निचले हिस्से की समस्याएँ जैसी स्वास्थ्य कठिनाइयाँ
- शरीर में अकारण दर्द और पीड़ा
- प्रजनन से जुड़ी समस्याएँ
- अनिद्रा
मूलाधार चक्र को कैसे जागृत करें?
मूलाधार चक्र का बीज मंत्र — ‘लं’ है। इसे आध्यात्मिक चेतना की ध्वनि कहा गया है। जब ‘लं’ का जप ध्यान और एकाग्रता के साथ रूट चक्र की दिशा में किया जाता है, तब इस स्तर की ऊर्जा सक्रिय होती है। माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा संस्कृत वर्ण ‘ल’ के ऊपर स्थित बिंदु में निवास करते हैं। उनके चार मुख और चार भुजाएँ हैं तथा उनका वर्ण गहरा रक्तिम है। अपनी चार भुजाओं में वे एक दण्ड, अमृत-कलश, ध्यान की जप-माला और भयनिवारक मुद्रा धारण किए हुए हैं। कुछ चित्रणों में दण्ड और जप-माला के स्थान पर वे हाथों में कमल पुष्प और धर्म-ग्रंथ धारण किए दिखाई देते हैं। प्रभु अपने हंस-वाहन पर विराजमान हैं। उनकी शक्ति देवी डाकिनी उनके साथ चित्रित की जाती हैं। उनके तीन नेत्र और चार भुजाएँ हैं, उनका वर्ण लाल अथवा श्वेत है और वे अपने वाहन हंस पर बैठी हुई हैं; अपनी प्रत्येक भुजा में वे त्रिशूल, खप्पर वाला दण्ड, हंस और एक पात्र धारण किए हैं। कुछ अन्य चित्रणों में हंस और पात्र के स्थान पर वे तलवार और ढाल भी धारण किए दर्शाई जाती हैं। (संदर्भ) इस मंत्र का जप चक्र में संचित तनाव और अवरोधों को मुक्त करता है तथा उसकी जीवन-शक्ति को सक्रिय करता है। हमारे भीतर सुप्त ऊर्जाएँ पुनः जागृत हो उठती हैं। रूट चक्र में सुखद अनुभूतियों के साथ कभी-कभी पीड़ादायक अनुभूतियाँ भी उभर सकती हैं। हमारी चेतना में गहरे दबे हुए घाव और निराशाएँ सतह पर आकर उपचार और समाधान की प्रतीक्षा करती हैं। नकारात्मक भावनाओं को तब तक धोकर बाहर नहीं किया जा सकता जब तक उन्हें जागृत कर सतह पर नहीं लाया जाता। यही कारण है कि रूट चक्र को जागृत करना अनिवार्य है। निराशाओं को भी आत्मोन्नति की सीढ़ियाँ बनाया जा सकता है। जब इन्हें रूट चक्र में सुलझाकर सतह पर लाया जाता है, तो ये लाभदायक अनुभवों में रूपांतरित हो सकती हैं और विकास के अवसरों के रूप में नई दृष्टि से देखी जा सकती हैं। यहीं से आत्म-अन्वेषण और आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग आरम्भ होता है। यदि हम इन नकारात्मक भावनाओं पर कार्य नहीं करते, तो ये रूट चक्र के बंद कोनों में अंधकार-सी छिपी रहती हैं और अचेतनता तथा नकारात्मक ऊर्जाओं के रूप में प्रकट होती हैं; ऐसे में आध्यात्मिक यात्रा कभी आरम्भ ही नहीं हो पाती। हम यातना, पीड़ा और शोक के भँवर में डूबे रहते हैं।मूलाधार चक्र को खोलना और सक्रिय करना
अपने चक्रों की पहचान कर उन पर कार्य करने से शीघ्र चिकित्सा सम्भव है। रूट चक्र को खोलने के अनेक उपाय हैं। ज़मीन से जुड़ाव पर केंद्रित ध्यान उन्हीं विधियों में से एक है। नियमित योगाभ्यास शरीर की शारीरिक और मानसिक शक्ति को बढ़ाता है। सकारात्मक संकल्प-वाक्य आपको पुरानी आदतों को बदलने और नई आदतें बनाने के लक्ष्य निर्धारित करने में सहायता करते हैं। रूट चक्र को सशक्त बनाने में सहायक कुछ सकारात्मक संकल्प-वाक्य ये हैं:- मेरे भीतर सुरक्षा और संरक्षण का भाव है।
- मेरी जड़ें गहरी हैं।
- मैं दृढ़तापूर्वक स्थापित हूँ।
- मैंने अपनी आंतरिक शान्ति पा ली है।
- मैं अधिक विश्वासी और साहसी हूँ।
- मैं आत्म-जागरूक हूँ और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखता हूँ।
- मेरे लिए सभी सम्भावनाएँ खुली हैं।
रूट चक्र के संतुलन के लिए योगासन
शवासन (कॉर्प्स पोज़)
यह शव के समान दिखने वाली एक योग-मुद्रा है।अपने नीचे की पृथ्वी को आपको पूरी तरह संभालने दीजिए और शरीर के समस्त तनाव को छोड़ दीजिए। प्रत्येक श्वास-प्रश्वास के साथ स्वयं को स्मरण कराइए — “मैं सुरक्षित हूँ, मुझे सहारा प्राप्त है।”सूर्य नमस्कार
सूर्य नमस्कार आपको अपनी आंतरिक शक्ति और पृथ्वी से जुड़ाव के बोध तक पहुँचाने में सहायक है। भीतर से एक मृदु, स्थिर ऊष्मा का संचार आप अनुभव करेंगे। प्रत्येक श्वास और प्रश्वास से जुड़ते हुए आप शक्ति और एकाग्रता का अनुभव करेंगे। ज्यों-ज्यों आप अपने इस गतिशील ध्यान में और गहराई में उतरते जाएँगे, आप देखेंगे कि मन वर्तमान क्षण के समक्ष समर्पित होता जा रहा है। यदि सहज लगे तो आँखें बंद कर लीजिए।शशांकासन (बाल मुद्रा)
अपने पूरे शरीर को शिथिल होने दीजिए। यह अनुभव कीजिए कि कैसा प्रतीत होता है जब पैरों के नीचे की भूमि आपको पूरी तरह सहारा देती है। समर्पण और सहारे के इस मेल को अपने अभ्यास का संचालन करने दीजिए।अर्ध सेतु बंधासन
यह मुद्रा आपको अपने पैरों को भूमि पर दृढ़ता से जमाए रखने का अवसर देती है। साथ ही रीढ़ कण्ठ और हृदय चक्रों को भी सक्रिय करती है, जिससे रूट चक्र की अतिरिक्त ऊर्जा मुक्त होती है।सुख हनुमानासन (सरल हनुमानासन)
इस मुद्रा में पसोआस और जाँघ की माँसपेशियाँ गहराई से खींची जाती हैं। ये माँसपेशियाँ प्रथम चक्र के ऊर्जा-केंद्र से जुड़ी हुई हैं और हमारी “लड़ो या भागो” प्रतिक्रिया से सम्बद्ध हैं। यहाँ 5 गहरी श्वासें लीजिए ताकि माँसपेशियों को अवशिष्ट संघर्ष-ऊर्जा को साहसिक और साथ ही शांत आंतरिक बल में रूपांतरित करने का समय मिल सके।मालासन (माला मुद्रा)
हमारे पैर हमारी जड़ें हैं, और इन्हीं के माध्यम से हम पृथ्वी की ऊर्जा अनुभव करते हैं। घुटनों के बल बैठते समय अपने पैरों की उँगलियाँ नीचे की ओर मोड़कर पैरों के तलवों के ऊतकों को सक्रिय कीजिए। मुक्त करने से पूर्व एक मिनट तक रुकिए। इसे तीन बार और दोहराइए।उत्तानासन (खड़े होकर आगे की ओर झुकना)
उत्तानासन व्यग्र मन को शांत और केंद्रित करने का एक उत्तम योगासन है। इसके साथ ही यह जाँघों के पीछे की माँसपेशियों को खींचता है और पीठ भर के तनाव को कम करता है।वीरभद्रासन II (Warrior II)
“वीरभद्र” का अर्थ है “उग्र योद्धा”। दोनों पैर भूमि पर दृढ़ता से टिके रहते हुए यह मुद्रा शरीर की ऊर्जा-धारा को स्वाभाविक रूप से प्रवाहित करती है, जिससे आप अपने भीतर संचित शक्ति और दृढ़-संकल्प तक पहुँच पाते हैं।वृक्षासन (पेड़ की मुद्रा)
इस योगासन से संतुलन, एकाग्रता और एकनिष्ठता — सभी में सुधार होता है। यह रूट चक्र को सक्रिय कर बड़ी आँत और एड्रिनल ग्रंथियों के कार्य को संतुलित करता है। पैरों की कण्डराएँ और स्नायु भी मज़बूत और सुडौल होते हैं। कूल्हे के जोड़, जाँघ का ऊपरी भाग और भीतरी जाँघें — सभी को वृक्षासन से राहत मिलती है।ताड़ासन (पर्वत मुद्रा)
ताड़ासन रीढ़ की माँसपेशियों को मज़बूत बनाता है और साथ ही मुद्रा-संतुलन (पॉश्चर) में भी सुधार करता है। इस योगासन में शरीर की प्राकृतिक संरेखा पुनर्स्थापित होती है। इसका नियमित अभ्यास मन में नीरवता और शान्ति लाकर मानसिक जागरूकता को बढ़ाता है। ताड़ासन हमें संतुलित और शिथिल कर केंद्रित और एकाग्र अनुभव कराता है।प्रकृति से पुनः जुड़ाव
प्रकृति-चिकित्सा (नेचर थेरेपी) न केवल रूट चक्र के लिए, बल्कि हमारे समूचे अस्तित्व के लिए सबसे प्रभावी उपचारों में से एक है। आधुनिक कार्य-संस्कृति के कारण हम अधिकांश समय भीतर बंद रहते हैं और प्रकृति तथा पर्यावरण से अपना जुड़ाव खो देते हैं। बाहरी वातावरण से अनुपस्थिति न केवल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि मानसिक रूप से थका देने वाली भी है। इससे चिंता, आत्म-विश्वास का अभाव और अवरुद्ध रूट चक्र — ये सब उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी पुनरुज्जीवित करने वाली प्रकृति में टहलना ही एकमात्र चिकित्सा होती है जिसकी हमें आवश्यकता है। पैरों के नीचे घास का स्पर्श, समुद्री हवा की सुगंध, चिड़ियों की चहचहाहट, और किसी वृक्ष की छाया तले एकांत के क्षण — इन्हीं में शान्ति और सामंजस्य निवास करते हैं।संक्षेप में
जब मूलाधार चक्र सक्रिय होता है और ऊर्जा का प्रवाह निर्बाध रहता है, तब वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आनंद का संचार करता है। एक स्वस्थ और संतुलित रूट चक्र हमारी पार्थिव प्रवृत्तियों से गहरा संपर्क बनाता है। यह आत्म-सम्मान को बढ़ाता है और समग्र आत्म-विश्वास को सशक्त करता है। मूलाधार चक्र की ऊर्जा प्रत्येक व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में शक्ति और दृढ़ता जुटाने का सामर्थ्य देती है।
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