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Rituals

नारायण बलि पूजा: संपूर्ण विधि और अकाल मृत्यु उपाय 2026

Prakhar Porwal · 1 मिनट पढ़ें
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    इस लेख में
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    u003culu003eu003cliu003eu003cstrongu003eसंस्कृत नाम:u003c/strongu003e नारायण-नागबलि / प्रेत-मोक्ष-यज्ञu003c/liu003eu003cliu003eu003cstrongu003eशास्त्रीय आधार:u003c/strongu003e गरुड़ पुराण, प्रेत खण्ड (अध्याय २७, ४०, ४४)u003c/liu003eu003cliu003eu003cstrongu003eमुख्य उद्देश्य:u003c/strongu003e अकाल मृत्यु से ग्रस्त आत्मा को प्रेतयोनि से मुक्तिu003c/liu003eu003cliu003eu003cstrongu003eअवधि:u003c/strongu003e तीन दिन (नारायण बलि + नाग बलि + गणेश पूजन)u003c/liu003eu003cliu003eu003cstrongu003eमुख्य स्थान:u003c/strongu003e प्रयागराज, गया, त्र्यंबकेश्वर, हरिद्वारu003c/liu003eu003cliu003eu003cstrongu003eलागत:u003c/strongu003e ₹31,000 (प्रयागराज में Prayag Pandits)u003c/liu003eu003cliu003eu003cstrongu003eNRI सेवा:u003c/strongu003e उपलब्ध — वीडियो कॉल पर संकल्प, रिकॉर्डिंग सहितu003c/liu003eu003c/ulu003e

    जब किसी परिजन की मृत्यु अचानक हो जाती है — दुर्घटना में, आत्महत्या से, सर्पदंश से, या किसी अन्य असामयिक कारण से — तो वह आत्मा प्रेतयोनि में फँस जाती है। ऐसी आत्मा न पितृलोक पहुँच पाती है और न मोक्ष। परिवार में पीड़ा बनी रहती है, संतान को कष्ट होता है, और पितृ दोष के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

    गरुड़ पुराण में वर्णन है कि अकाल मृत्यु से पीड़ित आत्मा को नारायण बलि के बिना मुक्ति नहीं मिलती।

    इसी कारण से हमारे ऋषियों ने नारायण बलि पूजा का विधान दिया — एक तीन दिवसीय वैदिक अनुष्ठान जो अकाल मृत्यु से ग्रस्त आत्मा को प्रेतयोनि से मुक्त करता है और उसे सद्गति की ओर ले जाता है।

    नारायण बलि पूजा क्या है? — शास्त्रीय आधार

    नारायण बलि पूजा एक विशेष श्राद्ध-संस्कार है जो सामान्य पिंड दान से भिन्न है। यह उन आत्माओं के लिए है जिनकी मृत्यु अस्वाभाविक रूप से हुई हो। गरुड़ पुराण (सारोद्धार, अध्याय १२, श्लोक ६-१०) में पाँच कलशों की विधि वर्णित है — पहले कलश पर सोने की मूर्ति (विष्णु), दूसरे पर चाँदी की (ब्रह्मा), तीसरे पर ताँबे की (रुद्र), चौथे पर लोहे की (यम), और मध्य में प्रेत-कलश — जो आटे की प्रतीकात्मक देह का आधार बनता है। यह पाँच-कलश विन्यास नारायण बलि की मूल शास्त्रीय संरचना है।

    इस अनुष्ठान में गेहूँ के आटे से मृत परिजन की प्रतीकात्मक प्रतिमा (आटे की मूर्ति) बनाई जाती है। फिर पाँच देवताओं को बलियाँ दी जाती हैं, जिससे उस प्रेत-आत्मा को दिव्य सत्ताओं की स्वीकृति मिलती है और वह पितृलोक की ओर प्रस्थान कर सकती है।

    नारायण बलि का नाम भगवान नारायण (विष्णु) के नाम पर है — क्योंकि यही एकमात्र देव हैं जो प्रेत-अवस्था को तोड़ने में सक्षम माने गए हैं। इस अनुष्ठान में नाग बलि (सर्पदोष निवारण) भी जुड़ी होती है, इसलिए इसे नारायण-नागबलि भी कहते हैं।

    कब करानी चाहिए नारायण बलि पूजा?

    नारायण बलि पूजा की आवश्यकता उन परिवारों को होती है जहाँ किसी की मृत्यु निम्नलिखित कारणों में से किसी एक से हुई हो। गरुड़ पुराण इन बारह कारणों को अकाल मृत्यु की श्रेणी में रखता है:

    1. दुर्घटना — सड़क, रेल, वायु दुर्घटना
    2. जल में डूबना — नदी, कुएँ, समुद्र में
    3. आत्महत्या — किसी भी तरीके से
    4. हत्या — दूसरे के हाथों मृत्यु
    5. सर्पदंश — विषधर जीव का काटना
    6. बिजली गिरना — वज्रपात से मृत्यु
    7. ऊँचाई से गिरना — पहाड़, मकान, पेड़ से
    8. भूख-प्यास से — अत्यधिक कुपोषण से
    9. जानवर के हमले से — शेर, भालू आदि
    10. अग्निकांड — आग से मृत्यु
    11. शाप से — किसी के शाप की परिणति
    12. महामारी — संक्रामक रोग से असमय मृत्यु

    इसके अतिरिक्त, यदि परिवार में पितृ दोष के लक्षण हों — जैसे संतान को बार-बार कष्ट, व्यवसाय में असफलता, गर्भपात, या स्वप्न में पूर्वज दिखना — तो भी नारायण बलि का विचार करना उचित है। पितृ दोष के लक्षण और उपाय के बारे में विस्तार से जानें।

    महत्त्वपूर्ण: पिंड दान और नारायण बलि अलग हैं
    सामान्य श्राद्ध और पिंड दान पितृलोक में स्थित पितरों के लिए है। u003cstrongu003eनारायण बलिu003c/strongu003e उन प्रेत-आत्माओं के लिए है जो अभी पितृलोक पहुँची ही नहीं हैं। अगर अकाल मृत्यु हुई है, तो पहले नारायण बलि — फिर नियमित श्राद्ध।

    नारायण बलि पूजा की संपूर्ण विधि: तीन दिवसीय अनुष्ठान

    नारायण बलि पूजा तीन दिनों में पूर्ण होती है। हर दिन का अपना अलग उद्देश्य और विधान है। यह क्रम शास्त्रसम्मत है और इसे तोड़ा नहीं जा सकता।

    पहला दिन: नारायण बलि — आत्मा को सद्गति

    पहले दिन का अनुष्ठान ही मूल नारायण बलि है। इसके चरण:

    1. संकल्प (Sankalp) — प्रधान कर्ता (परिवार का ज्येष्ठ पुत्र या अधिकृत सदस्य) पंडित जी के साथ संकल्प लेता है। संकल्प में मृत परिजन का नाम, गोत्र, तिथि और मृत्यु का कारण उच्चारित किया जाता है।
    2. आटे की मूर्ति (Atta ki Moorti) — गेहूँ के आटे से मृत परिजन की प्रतीकात्मक प्रतिमा बनाई जाती है। यह प्रेत-शरीर का प्रतीक है।
    3. पाँच बलियाँ — ब्रह्मा, विष्णु, शिव, यमराज और प्रेतराज को बारी-बारी बलियाँ दी जाती हैं। प्रत्येक बलि के साथ विशेष मंत्रोच्चार होता है।
    4. नारायण बलि मंत्र — पंडित जी नारायण बलि सूक्त और गरुड़ पुराण के प्रेत-मोक्ष मंत्रों का पाठ करते हैं।
    5. आटे की मूर्ति का दहन — मूर्ति का अग्नि-संस्कार (दाह) किया जाता है, जो प्रतीकात्मक रूप से प्रेत-शरीर को मुक्त करता है।
    6. तर्पण — जल में तिल मिलाकर मृत आत्मा को तर्पण दिया जाता है।

    पहले दिन की पूजा में उच्चारित यह मंत्र आत्मा को सद्गति की ओर आकर्षित करता है:

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। प्रेतत्वाद् उद्धर मां नारायण। सर्व-पाश-विमुक्तस्य गतिं देहि परां प्रभो।।
    अर्थ: हे वासुदेव नारायण, मुझे प्रेतयोनि से उद्धार करो। सभी पाशों से मुक्त करके परम गति प्रदान करो, हे प्रभु।

    इस मंत्र के साथ-साथ पंडित जी विष्णु सहस्रनाम का संक्षिप्त पाठ भी करते हैं, जिससे नारायण की उपस्थिति अनुष्ठान-स्थल पर बनी रहती है।

    पहले दिन के बाद आत्मा को प्रेतयोनि से आंशिक मुक्ति मिलती है और वह नारायण के द्वार पर पहुँचती है।

    दूसरा दिन: नाग बलि — सर्पदोष निवारण

    दूसरा दिन नाग बलि का है। यह तब विशेष रूप से आवश्यक होता है जब:

    • मृत्यु का कारण सर्पदंश हो
    • परिवार में सर्पदोष के लक्षण हों (नाग-स्वप्न, कुंडली में दोष)
    • कभी कोई सर्प की हत्या हुई हो

    नाग बलि विधि:

    1. मिट्टी या सोने की सर्प-मूर्ति — नाग का प्रतीकात्मक निर्माण
    2. नाग पंचमी स्तोत्र पाठ — नाग देवता की स्तुति
    3. सर्प-बलि — नाग देवता को बलि (अन्न, दूध, पुष्प) अर्पण
    4. क्षमाप्रार्थना — यदि कभी सर्प की हत्या हुई हो तो उसके लिए क्षमा याचना
    5. नाग-विसर्जन — मूर्ति को जल में विसर्जित करना

    नाग बलि तीर्थ-पुरोहितों की परम्परागत विधि है। त्र्यंबकेश्वर को इस अनुष्ठान के लिए स्थानीय परम्परा में विशेष माना जाता है, यद्यपि यह विधि किसी भी पवित्र नदी तट पर की जा सकती है। किन्तु प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर भी यह विधि पूर्ण फल देती है। दूसरे दिन का मुख्य नाग मंत्र है:

    ॐ नागेभ्यो नमः। सर्पदोषं क्षमस्व मे। आत्मानं मुञ्च पितृभ्यः शान्तिं देहि कुलाय मे।।
    अर्थ: हे नाग देवता, मुझे नमन। सर्पदोष को क्षमा करें। इस आत्मा को पितरों तक पहुँचाएँ और मेरे कुल को शांति दें।

    तीसरा दिन: गणेश पूजन, पुण्यवाचन और गौदान

    तीसरा दिन अनुष्ठान का समापन-दिवस है। इस दिन तीन कार्य होते हैं:

    1. गणेश पूजन — विघ्न-निवारण के लिए गणेश जी की आराधना, जिससे अनुष्ठान का फल बाधारहित मिले।
    2. पुण्यवाचन — ब्राह्मण पुण्यवचन पाठ करते हैं, जिससे अनुष्ठान का पुण्य स्थिर होता है और परिवार को आशीर्वाद मिलता है।
    3. पाँच गौ दान (Panch Gau Daan) — पाँच गायों का दान (या उनके तुल्य धन-दान)। गरुड़ पुराण (प्रेत खण्ड, अध्याय ४, श्लोक १५०) का यह स्पष्ट विधान है — एक दूधारू गाय का दान ब्राह्मण को दिया जाए, जिससे भगवान विष्णु की प्रसन्नता प्राप्त हो और पितरों का मार्ग प्रशस्त हो।

    अंत में पंडित जी और सभी ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। इस विदाई के साथ ही तीन दिन का अनुष्ठान पूर्ण होता है।

    नारायण बलि पूजा कहाँ होती है?

    सभी तीर्थ स्थानों पर नारायण बलि समान फल नहीं देती। शास्त्रों ने कुछ विशेष स्थानों को इस अनुष्ठान के लिए श्रेष्ठ माना है:

    तीर्थशास्त्रीय आधारविशेषता
    प्रयागराज (त्रिवेणी संगम)स्कन्द पुराण एवं ब्रह्म पुराण — तीर्थराजगंगा-यमुना-सरस्वती संगम; तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ
    गया (फल्गु नदी)गरुड़ पुराण, आचार काण्ड (पूर्व खण्ड), अध्याय ८२-८६विष्णुपद मंदिर; राम जी ने यहाँ दशरथ का पिंड दान किया
    त्र्यंबकेश्वर (नासिक)तीर्थ-पुरोहितों की पारम्परिक स्थल-परम्परानारायण-नागबलि के लिए विशेष — शिव का द्वादश ज्योतिर्लिंग
    हरिद्वारहरिद्वार — गंगा तीर्थ (गंगा माहात्म्य, सामान्य प्रमाण)गंगा का पहला मैदानी घाट; अस्थि विसर्जन के साथ नारायण बलि

    स्कन्द पुराण और ब्रह्म पुराण प्रयागराज को तीर्थराज की उपाधि देते हैं। यहाँ किया गया श्राद्ध-कर्म पितरों को अक्षय फल देता है।

    प्रयागराज में नारायण बलि पूजा — त्रिवेणी संगम

    प्रयागराज का त्रिवेणी संगम — गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का मिलन स्थल — नारायण बलि के लिए भारत का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। यहाँ तीन नदियों का जल एक साथ मिलता है, जिससे इस स्थान की आध्यात्मिक शक्ति अतुलनीय हो जाती है।

    Prayag Pandits प्रयागराज में पिछले कई वर्षों से नारायण बलि पूजा कराते आ रहे हैं। उनकी सेवा में शामिल है:

    • पाँच वेदपाठी पंडित जी जो तीनों दिन उपस्थित रहते हैं
    • संपूर्ण पूजा सामग्री (आटा, तिल, घी, दूध, पुष्प, वस्त्र सहित)
    • पाँच गायों का दान (Gau Daan) की व्यवस्था
    • त्रिवेणी संगम पर नाव सहित अनुष्ठान
    • पूरी विधि की वीडियो रिकॉर्डिंग
    • प्रमाण-पत्र (Certificate) हिंदी और अंग्रेजी में

    प्रयागराज में नारायण बलि पूजा बुक करें — ₹31,000 में संपूर्ण व्यवस्था।

    प्रयागराज में नारायण बलि की विशेषता यह है कि यहाँ तर्पण और विसर्जन तीनों नदियों के संगम-जल में होता है। गंगा की पवित्रता, यमुना की क्षमाशीलता और सरस्वती की ज्ञान-शक्ति — तीनों का एक साथ स्पर्श आत्मा को असाधारण शुद्धि देता है। इसीलिए स्कन्द पुराण और ब्रह्म पुराण ने प्रयागराज को तीर्थराज की उपाधि दी है।

    प्रयागराज में अनुष्ठान के लिए सर्वश्रेष्ठ तिथियाँ हैं: अमावस्या, पूर्णिमा, पितृपक्ष की सभी तिथियाँ, और एकादशी। Prayag Pandits पितृपक्ष 2026 (26 सितंबर — 10 अक्टूबर) के दौरान विशेष बुकिंग स्लॉट उपलब्ध कराते हैं।

    यदि आप हरिद्वार में नारायण बलि पूजा कराना चाहते हैं, तो वह सेवा भी उपलब्ध है। प्रयागराज में पिंड दान के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें।

    नारायण बलि बनाम पिंड दान — क्या अंतर है?

    यह भ्रम बहुत आम है। दोनों श्राद्ध-कर्म हैं, किन्तु उनका उद्देश्य और समय अलग है:

    पहलूपिंड दाननारायण बलि पूजा
    आत्मा की दशापितृलोक में स्थित पितरों के लिएप्रेतयोनि में फँसी अकाल-मृत आत्मा के लिए
    उद्देश्यपितरों को तृप्ति और ऊर्ध्वगतिप्रेत-आत्मा को मोक्ष / सद्गति
    अवधि1 दिन (पितृपक्ष में या अमावस्या)3 दिन
    पात्रसभी परिवार — स्वाभाविक मृत्युअकाल/अस्वाभाविक मृत्यु वाले परिवार
    शास्त्रीय क्रमनारायण बलि के बादपहले — पितृलोक का मार्ग खोलता है

    सरल शब्दों में: नारायण बलि पहले, पिंड दान बाद में। जब तक आत्मा प्रेतयोनि में है, पिंड दान का पूरा लाभ नहीं मिलता। पहले नारायण बलि से उसे पितृलोक का मार्ग दिखाएँ, फिर नियमित श्राद्ध में पिंड दान करें।

    पिंड दान की संपूर्ण जानकारी के लिए यह मार्गदर्शिका पढ़ें।

    इसी प्रकार त्रिपिंडी श्राद्ध भी एक विशेष अनुष्ठान है जो उन आत्माओं के लिए है जिनका सामान्य श्राद्ध वर्षों तक नहीं हुआ। नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध — दोनों असाधारण परिस्थितियों में किए जाते हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं।

    नारायण बलि पूजा और पितृ दोष — क्या संबंध है?

    बहुत से परिवारों में पितृ दोष के लक्षण दिखते हैं — जैसे कि बार-बार संतान को कष्ट होना, व्यवसाय में अचानक नुकसान, घर में अशांति, या स्वप्न में पूर्वज दुखी दिखना। ये सब संकेत हो सकते हैं कि परिवार में किसी अकाल-मृत आत्मा का श्राद्ध नहीं हुआ।

    गरुड़ पुराण कहता है कि जब कोई अकाल-मृत आत्मा प्रेतयोनि में रहती है और उसका उचित उद्धार नहीं किया जाता, तो वह अपनी पीड़ा कुल के जीवित सदस्यों तक पहुँचाती है। यही पितृ दोष का मूल है।

    नारायण बलि पूजा ऐसे परिवारों के लिए सबसे प्रभावशाली उपाय है। अनुष्ठान के बाद:

    • प्रेत-आत्मा को मुक्ति मिलती है और कुल से उसका नकारात्मक प्रभाव समाप्त होता है
    • परिवार को पितरों का आशीर्वाद मिलता है
    • पितृ दोष के लक्षण धीरे-धीरे कम होने लगते हैं
    • संतान के जीवन में सुख और प्रगति का मार्ग खुलता है

    यदि आप जानना चाहते हैं कि आपके परिवार में पितृ दोष है या नहीं, तो पितृ दोष के लक्षण और 14 प्रकार विस्तार से पढ़ें। पंडित जी से कुंडली दिखाकर सलाह लें — तभी तय करें कि नारायण बलि की आवश्यकता है या त्रिपिंडी श्राद्ध पर्याप्त है।

    नारायण बलि पूजा के लाभ

    शास्त्रों और हमारे अनुभव के आधार पर नारायण बलि पूजा के सात प्रमुख लाभ हैं:

    1. आत्मा को मुक्ति — प्रेतयोनि से बाहर निकलकर सद्गति की प्राप्ति। आत्मा मोक्ष की ओर अग्रसर होती है और पितृलोक का मार्ग उसके लिए खुलता है।
    2. पितृ दोष से राहतपितृ दोष के लक्षण धीरे-धीरे कम होने लगते हैं क्योंकि उनका मूल कारण — अकाल-मृत प्रेत — मुक्त हो जाता है।
    3. परिवार में शांति — बार-बार होने वाले कष्टों और स्वप्नों से मुक्ति। कई परिवारों ने बताया है कि अनुष्ठान के बाद घर का वातावरण हल्का और शांत हो गया।
    4. स्वास्थ्य में सुधार — अकाल-मृत आत्मा की पीड़ा कुल के जीवित सदस्यों में अजीब बीमारियों के रूप में प्रकट हो सकती है। नारायण बलि से इस ऊर्जा-अवरोध का निवारण होता है।
    5. बाधाओं का निवारण — व्यवसाय और विवाह में आ रही रुकावटें दूर होती हैं। विशेष रूप से जहाँ जातक की कुंडली में राहु या शनि की दशा पितृ-संबंधित बाधा दिखाती हो।
    6. पूर्वजों की शांति — अशांत आत्माएँ तृप्त होकर परिवार को आशीर्वाद देती हैं। पितरों का आशीर्वाद जीवन में सुख, संतान-सुख और दीर्घायु लाता है।
    7. पुण्य-संचय — कर्ता को अनुष्ठान से विशेष आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होता है। धर्मशास्त्र में इसे पितृ-ऋण से मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय माना गया है।

    नारायण बलि पूजा में कितना खर्च आता है?

    नारायण बलि पूजा में तीन दिन, पाँच पंडित, गौ-दान और संपूर्ण सामग्री शामिल होती है — इसलिए यह पिंड दान की तुलना में अधिक विस्तृत और लंबी विधि है। लागत स्थान और व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग होती है:

    स्थानलागतसेवा प्रदाता
    प्रयागराज (त्रिवेणी संगम)₹31,000Prayag Pandits — बुक करें
    हरिद्वार (हर की पौड़ी)₹31,000Prayag Pandits — बुक करें
    ऑनलाइन (NRI / प्रवासी)उपलब्धPrayag Pandits — ऑनलाइन बुक करें

    इस लागत में शामिल है: पाँच पंडितों की दक्षिणा, तीनों दिन की संपूर्ण पूजा सामग्री, नाव का किराया (संगम स्नान के लिए), गौ-दान और वीडियो रिकॉर्डिंग।

    नोट: त्र्यंबकेश्वर (नासिक) में नारायण-नागबलि के लिए वहाँ के पंडित अलग दर लेते हैं — ₹20,000 से ₹50,000 तक। यह सेवा Prayag Pandits नहीं देते। त्र्यंबकेश्वर में नारायण नागबलि पूजा के बारे में यहाँ जानें।

    बुकिंग से पहले ध्यान दें
    नारायण बलि पूजा के लिए बुकिंग करते समय मृत परिजन का u003cstrongu003eनाम, गोत्र, मृत्यु की तिथि और कारणu003c/strongu003e तैयार रखें। ये संकल्प में आवश्यक हैं। यदि सटीक जानकारी न हो तो Prayag Pandits के पंडित जी मार्गदर्शन करेंगे।

    प्रवासी भारतीयों (NRI) के लिए व्यवस्था

    यदि आप विदेश में रहते हैं — अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, या खाड़ी देशों में — और व्यक्तिगत रूप से भारत नहीं आ सकते, तो भी नारायण बलि पूजा संभव है।

    Prayag Pandits की ऑनलाइन नारायण बलि पूजा सेवा में:

    1. प्रतिहारी व्यवस्था — यदि आप उपस्थित नहीं हो सकते, तो Prayag Pandits का एक प्रतिनिधि आपकी ओर से कर्ता बनता है।
    2. वीडियो कॉल पर संकल्प — WhatsApp या Zoom पर आप सीधे पंडित जी से जुड़कर संकल्प के समय उपस्थित रहते हैं।
    3. तीनों दिन की लाइव रिकॉर्डिंग — पूरे अनुष्ठान का वीडियो आपको व्हाट्सएप पर भेजा जाता है।
    4. प्रमाण-पत्र — हिंदी और अंग्रेजी में अनुष्ठान का प्रमाण-पत्र।

    NRI सेवा के लिए अभी संपर्क करें: WhatsApp: +91-77540-97777

    NRI पिंड दान सेवा के बारे में अधिक जानकारी यहाँ उपलब्ध है।

    24/7 उपलब्ध

    🙏 नारायण बलि पूजा — प्रयागराज या हरिद्वार में

    से शुरू ₹31,000 per person

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    Prayag Pandits 2019 से प्रयागराज में श्राद्ध, पिंड दान और नारायण बलि जैसे अनुष्ठान संपन्न करा रहे हैं। 2,263 से अधिक परिवारों का विश्वास, 11 पवित्र नगरों में सेवा, और हर अनुष्ठान में शास्त्रसम्मत विधि — यही हमारी पहचान है।

    नारायण बलि पूजा के लिए बुकिंग के समय आपको चाहिए:

    • मृत परिजन का नाम और गोत्र
    • मृत्यु की तिथि और कारण
    • कर्ता का नाम और गोत्र
    • आपकी सुविधा की तिथियाँ

    बुकिंग के लिए: प्रयागराज नारायण बलि पूजा | हरिद्वार नारायण बलि पूजा | WhatsApp: +91-77540-97777

    अन्य श्राद्ध सेवाओं के बारे में जानने के लिए देखें: त्रिपिंडी श्राद्ध, प्रयागराज में श्राद्ध, और गया में पिंड दान

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    2,263+ परिवारों की सेवा वीडियो प्रमाण शामिल 2019 से
    लेखक के बारे में
    Prakhar Porwal
    Prakhar Porwal वैदिक अनुष्ठान सलाहकार, प्रयाग पंडित

    Prakhar Porwal is the founder of Prayag Pandits, a trusted platform for Vedic rituals and ancestral ceremonies. With deep roots in Prayagraj's spiritual traditions, Prakhar has helped over 50,000 families perform sacred rituals including Pind Daan, Shradh, and Asthi Visarjan across India's holiest cities.

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