मुख्य बिंदु
- महत्वपूर्ण: वंशावली खोज की सेवा अभी उपलब्ध नहीं है
- सप्तमी श्राद्ध क्या है?
- सप्तमी श्राद्ध 2026 — तिथि और मुहूर्त
- सप्तमी तिथि पर श्राद्ध किसे करना चाहिए?
इस लेख में
सप्तमी श्राद्ध — पितृ पक्ष के पवित्र पक्ष में कृष्ण पक्ष की सातवीं तिथि को मनाया जाने वाला पर्व — शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026 को पड़ता है। सातवीं चंद्र तिथि, सप्तमी, हिन्दू पंचांग के आध्यात्मिक दृष्टि से प्रभावशाली दिनों में से एक मानी जाती है। वैदिक ज्योतिष परंपरा में यह तिथि सूर्य से संबद्ध है और माना जाता है कि इसमें पितरों की मुक्ति के लिए विशेष शक्ति होती है। इस दिन हिन्दू परिवार उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध करते हैं जिनकी मृत्यु किसी भी महीने — शुक्ल या कृष्ण पक्ष — की सप्तमी तिथि को हुई हो। तर्पण, पिंड दान और ब्राह्मण भोज के साथ किया गया सप्तमी श्राद्ध पीढ़ियों के बीच की दूरी को मिटाता है और जीवित परिवार की श्रद्धा और प्रेम को दिवंगत आत्माओं तक पहुँचाता है।
सप्तमी श्राद्ध क्या है?
सप्तमी श्राद्ध पितृ पक्ष की तिथि-आधारित श्राद्ध परंपरा का अंग है। संबंधित तिथि को दिवंगत हुए पितरों का स्मरण उस दिन प्रमुख रूप से किया जाता है। तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण सोलह श्राद्ध नाम हमेशा सोलह अलग नागरिक तारीखों में नहीं आते।
संख्या सात (सप्त) का वैदिक परंपरा में गहरा महत्त्व है। सात पवित्र नदियाँ हैं, सात पवित्र नगर (सप्तपुरी) हैं, अस्तित्व के सात स्तर (सप्तलोक) हैं, और नभमंडल में सात ऋषि (सप्त ऋषि मण्डल) हैं। श्राद्ध के संदर्भ में सप्तमी तिथि को विशेष रूप से शुभ माना जाता है, क्योंकि पारम्परिक मान्यता है कि इस दिन की ऊर्जा आत्मा को अस्तित्व के सात लोकों में ऊपर की ओर — मोक्ष की दिशा में — गति देती है।
गरुड़ पुराण और पितृ-कर्म परंपराओं में पूर्वजों के स्मरण को महत्व दिया गया है। निर्धारित तिथि पर श्राद्ध करना श्रद्धा और पारिवारिक कर्तव्य का विषय माना जाता है। कोई अनुष्ठान छूटने पर भय या अपराधबोध में आने के बजाय कुल पुरोहित से उपयुक्त विकल्प पूछें। पूर्वजों के प्रति ऋण की परंपरा इस स्मरण का भाव समझाती है; किसी आत्मा की निश्चित अवस्था का दावा नहीं करती।
सप्तमी श्राद्ध 2026 — तिथि और मुहूर्त
2026 में पितृ पक्ष 26 सितम्बर (पूर्णिमा श्राद्ध) से 10 अक्टूबर (सर्वपितृ अमावस्या) तक रहेगा। 2026 में सप्तमी श्राद्ध शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026 को पड़ता है।
सप्तमी श्राद्ध के लिए निर्धारित शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- कुतप मुहूर्त: श्राद्ध के लिए परंपरागत रूप से उपयुक्त माना जाने वाला दिन का काल।
- रौहिण मुहूर्त: कुतप के बाद की संबंधित अवधि।
- अपराह्न काल: श्राद्ध के लिए विचार किया जाने वाला दोपहर का काल।
इन अवधियों का घड़ी का समय शहर, तिथि और सूर्योदय के अनुसार बदलता है। 2 अक्टूबर 2026 के लिए अनुष्ठान के वास्तविक स्थान का पंचांग देखें और पंडित से समय सुनिश्चित करें। बिना स्थान के दिए गए 11:36 या 12:24 जैसे समय को सभी शहरों पर लागू न मानें।
शुक्रवार का ज्योतिषीय संबंध शुक्र से माना जाता है, लेकिन इससे सप्तमी श्राद्ध की मृत्यु-तिथि संबंधी पात्रता नहीं बदलती। स्त्री या पुरुष पूर्वज के लिए उपयुक्त तिथि पारिवारिक परंपरा और मृत्यु की तिथि के अनुसार तय करें; गृह-सुख या किसी अन्य फल की गारंटी न मानें।
सप्तमी श्राद्ध, षष्ठी श्राद्ध (1 अक्टूबर) के बाद और अष्टमी श्राद्ध (3 अक्टूबर) से पहले आता है। जो परिवार बहु-दिवसीय श्राद्ध कर्म करना चाहते हैं, वे Prayag Pandits के माध्यम से प्रयागराज में निरंतर श्राद्ध सेवाओं की व्यवस्था कर सकते हैं।
सप्तमी तिथि पर श्राद्ध किसे करना चाहिए?
सप्तमी श्राद्ध का मुख्य अधिकार उन लोगों को है जिनके पूर्वज — पिता, माता, पितामह, मातामह, प्रपितामह और अन्य पुरखे — किसी भी महीने की सातवीं चंद्र तिथि को दिवंगत हुए हों। इसमें सभी बारह महीनों की शुक्ल और कृष्ण पक्ष की सप्तमी सम्मिलित है।
मुख्य आधार पूर्वज की मृत्यु की सप्तमी तिथि है। सूर्य-उपासना, विद्वत्ता या जन्मतिथि जैसे संबंध अपने-आप श्राद्ध की मृत्यु-तिथि का विकल्प नहीं हैं। नीचे के अन्य उल्लेख स्मरण की परंपरागत धारणाएँ हैं; उन्हें सार्वभौमिक पात्रता नियम न मानें:
- जिन पितरों की मृत्यु वर्ष के किसी भी महीने की सप्तमी तिथि को हुई हो
- वे पूर्वज जो भगवान सूर्य के उपासक थे — क्योंकि सप्तमी सूर्य की तिथि है और सौर भक्त इस दिन विशेष रूप से सम्मानित होते हैं
- वृद्ध दादा-दादी, नाना-नानी जिनकी निर्वाण तिथि ज्ञात न हो, किन्तु जो इस तिथि से विशेष रूप से जुड़े हों
- वे पूर्वज जो विद्वान, आचार्य या साधक थे — क्योंकि लोक-परम्परा में सातवीं तिथि ज्ञान और उन्नत चेतना से संबद्ध मानी जाती है
कुछ परिवार तीर्थ पर पिंडदान के साथ व्यापक पितृ-स्मरण करते हैं। सभी पूर्वजों का स्मरण कैसे करना है और मृत्यु तिथि अज्ञात हो तो क्या विकल्प है, यह कुल पुरोहित से पूछें। सप्तमी को हर अज्ञात मृत्यु-तिथि का अनिवार्य विकल्प न मानें। त्रिवेणी संगम का महत्व श्रद्धा की परंपरा में समझें।
सप्तमी श्राद्ध — विधि और अनुष्ठान
सम्पूर्ण सप्तमी श्राद्ध पार्वण श्राद्ध के प्रारूप में सम्पन्न होता है — यह धर्मशास्त्र में पितृ पक्ष के अनुष्ठानों के लिए निर्धारित पूर्ण श्राद्ध विधि है। चरण-दर-चरण विवरण नीचे दिया गया है:
1. पवित्र नदी में शुद्धिस्नान
दिन की शुरुआत पवित्र नदी या संगम पर स्नान से होती है। प्रयागराज में इसका अर्थ है — सूर्योदय से पहले या प्रातःकाल त्रिवेणी संगम पर पवित्र स्नान। कर्ता परिवार की परंपरा के अनुसार स्वच्छ वस्त्र, जैसे धोती या साड़ी, धारण कर सकता है और पूरे दिन शारीरिक व मानसिक पवित्रता बनाए रखनी चाहिए।
2. संकल्प — पवित्र संकल्प
संकल्प एक औपचारिक संस्कृत घोषणा है जिससे श्राद्ध अनुष्ठान का प्रारंभ होता है। कर्ता अपना नाम, पिता का नाम, अपना गोत्र (वैदिक ऋषि से जुड़ी पितृ-परम्परा), वर्तमान वर्ष, मास, तिथि, नक्षत्र और जिन पितरों का सम्मान किया जा रहा है उनके नाम का उल्लेख करता है। संकल्प अनुष्ठान का आधार-स्तम्भ है — यह सुनिश्चित करता है कि श्राद्ध का पुण्य अभीष्ट पितरों को ही मिले और बिखरे नहीं।
3. तर्पण — पितरों को जल-अर्पण
तर्पण काले तिल, जौ और कुशा से मिश्रित जल का मुख्य अर्पण है। सुरक्षित तट पर पंडित के मार्गदर्शन में, कर्ता दोनों हाथों में जल लेकर उसे दाहिनी हथेली से अंगूठे और तर्जनी के बीच से प्रवाहित करते हुए प्रत्येक अर्पण के साथ पितर का नाम और तर्पण मंत्र का उच्चारण करता है। अर्पण की संख्या, मुद्रा और मंत्र परंपरा के अनुसार पंडित से सीखें; इन्हें तीन अलग प्रकार की आत्मा का सार्वभौमिक नियम न मानें।
4. पिंड दान — पवित्र चावल के पिंडों का अर्पण
तर्पण के पश्चात् पंडित जी पिंड तैयार करते हैं — पके चावल में तिल, शहद, घी और कभी-कभी जौ का आटा और सुगन्धित जड़ी-बूटियाँ मिलाकर बनाए गए चावल के पिंड। ये पिंड दिवंगत पितर के भौतिक शरीर का प्रतीक हैं और नदी तट पर इनका अर्पण एक प्रतीकात्मक पोषण कर्म है। गरुड़ पुराण के अनुसार पिंड दान का महत्त्व यह है कि यह पिंड पितृ-आत्मा को एक अस्थायी सूक्ष्म शरीर प्रदान करता है जिसके माध्यम से वह अर्पण की ऊर्जा ग्रहण कर सकती है।
5. ब्राह्मण भोज — पवित्र अतिथि को भोजन
एक योग्य ब्राह्मण पंडित जी को प्याज, लहसुन और मांसाहार से रहित भोजन कराया जाता है। भोजन में सामान्यतः दाल, चावल, सब्जी, रोटी, मिठाई और फल सम्मिलित होते हैं। ब्राह्मण के भोजन से पहले एक भाग गौ-ग्रास (गाय के लिए), काक-बलि (कौओं के लिए), और कुत्तों व चींटियों के लिए अलग रखा जाता है। भोजन के पश्चात् ब्राह्मण को दोनों हाथों से और सच्चे आदर के साथ दक्षिणा — एक आदरणीय धन-राशि, धोती और कभी-कभी अन्य वस्त्र — प्रदान किए जाते हैं।
हिन्दू शास्त्रों में महत्त्व
सप्तमी तिथि का आध्यात्मिक महत्त्व विभिन्न पौराणिक और धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में मिलता है। वैदिक परंपरा में सातवाँ दिन सूर्य के लिए विशेष पवित्र माना जाता है, जो वैदिक सृष्टि-विधान में मनु वंश के आदि-उत्पत्तिकर्ता हैं — वही पूर्वज जिनसे समस्त मानव-जाति उत्पन्न हुई। लोक-परम्परा में इस सौर संबंध से सप्तमी श्राद्ध को एक अतिरिक्त ब्रह्माण्डीय आयाम मिलता है: इस दिन श्राद्ध करने से जीवित जन न केवल अपने तत्काल पितरों से, बल्कि मानवता की मूल पितृ-परम्परा से भी जुड़ते हैं।
पितृ पक्ष की प्रत्येक संबंधित तिथि का अपना महत्व है। सप्तमी से नवमी को सभी अन्य दिनों से निश्चित रूप से अधिक फलदायी बताने के बजाय परिवार की उचित श्राद्ध तिथि को प्राथमिकता दें।
प्रयागराज, गया और वाराणसी जैसे तीर्थों पर पितरों की सद्गति और मोक्ष की कामना से श्राद्ध किया जाता है। यह धार्मिक आस्था है; किसी निश्चित मुक्ति, परिणाम या आगंतुक संख्या का प्रमाण नहीं।
सप्तमी श्राद्ध में क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- श्राद्ध अनुष्ठान प्रारम्भ करने से पूर्व प्रातःकाल ऋग्वेद से पितृ स्तोत्र या पितृ सूक्त का पाठ करें
- तिल का उदारतापूर्वक उपयोग करें — तर्पण जल में, पिंड निर्माण में, और ब्राह्मण के भोजन में
- प्रातःकाल सूर्य अर्घ्य (सूर्य को जल अर्पण) करें, विशेषकर क्योंकि सप्तमी सूर्य की तिथि है
- ब्राह्मण भोज की संख्या अपनी परंपरा, सामर्थ्य और चुनी व्यवस्था के अनुसार तय करें; पुण्य को धन या संख्या के अनुपात में निश्चित न मानें
- परंपरा के अनुसार पितरों के स्मरण में सुरक्षित स्थान पर घी का दीपक जला सकते हैं; जलता दीपक बिना देखरेख न छोड़ें
- मुख्य अनुष्ठान के बाद पितरों के नाम पर गरीबों को भोजन, वस्त्र या धन का दान करें
क्या न करें
- भोजन संबंधी परंपरा पंडित से समझें; स्वास्थ्य और आवश्यक दवा की उपेक्षा न करें
- पितृ पक्ष में विलास और भोग से बचें — यह पखवाड़ा तप और स्मरण का है
- अनुष्ठान में प्लास्टिक या एकल-उपयोग की वस्तुओं का प्रयोग न करें — तांबे, पीतल या मिट्टी के पात्र परम्परागत और आध्यात्मिक दृष्टि से उपयुक्त हैं
- ब्राह्मण को बाएँ हाथ से भोजन न परोसें — सदैव दाहिने हाथ से या दोनों हाथों से परोसें
- कुछ परिवार पितृ पक्ष में नए मांगलिक आयोजन टालते हैं; आवश्यक यात्रा या दैनिक दायित्व पर इसे सार्वभौमिक रोक न मानें
- इस दिन किसी से कठोर वचन न कहें और किसी का अपमान न करें — श्राद्ध का पुण्य कर्ता के पूरे दिन के आचरण पर निर्भर करता है
Prayag Pandits के साथ सप्तमी श्राद्ध करें
प्रयागराज — जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का मिलन होता है — को मत्स्य पुराण (प्रयाग माहात्म्य) में पितृ-कर्मों के लिए समस्त तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। त्रिवेणी संगम का उल्लेख शास्त्रीय परम्परा में उस स्थान के रूप में मिलता है जहाँ श्राद्ध दिवंगत आत्मा को पूर्ण मोक्ष दिलाने में सक्षम है।
Prayag Pandits के माध्यम से उपलब्ध श्राद्ध सेवा का स्थान, तिथि और दायरा उत्पाद पृष्ठ तथा व्यक्तिगत समन्वय से सुनिश्चित करें। अनुभवी पंडित विधि और सामग्री में मार्गदर्शन देते हैं। ब्राह्मण भोज, दक्षिणा या अन्य कर्म तभी शामिल मानें जब चुनी हुई सेवा उनका स्पष्ट उल्लेख करे।
सप्तमी श्राद्ध के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पितृ पक्ष के अन्य अनुष्ठानों के लिए षष्ठी श्राद्ध 2026 (1 अक्टूबर) और अष्टमी श्राद्ध 2026 (3 अक्टूबर) पर हमारे मार्गदर्शिकाएँ देखें। पितृ पक्ष के सम्पूर्ण पंचांग और सोलह दिनों के पितृ-अनुष्ठान के लिए हमारी पितृपक्ष सम्पूर्ण अनुष्ठान मार्गदर्शिका देखें।
Prayag Pandits की संबद्ध सेवाएँ
- 🙏 गया में पिंड दान (पितृपक्ष) — प्रारम्भिक मूल्य ₹7,100
- 🙏 प्रयागराज में श्राद्ध — प्रारम्भिक मूल्य ₹7,100
- 🙏 प्रयागराज में तर्पण — प्रारम्भिक मूल्य ₹5,100
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