मुख्य बिंदु
- प्रतिपदा श्राद्ध क्या है
- प्रतिपदा-तिथि-मृत पूर्वजों के लिए विशेष महत्व
- शुक्ल प्रतिपदा बनाम कृष्ण प्रतिपदा का अंतर
- निर्णय सिन्धु और धर्म सिन्धु में प्रतिपदा का विधान
इस लेख में
प्रतिपदा श्राद्ध पितृ पक्ष की प्रथम तिथि का विशेष कर्म है। इसका प्रमुख विधान उन पूर्वजों के लिए है जिनका देहावसान किसी भी पक्ष की प्रतिपदा तिथि को हुआ हो। कुछ परम्पराओं में नाना-नानी के श्राद्ध के लिए भी यह तिथि उपयुक्त मानी जाती है, विशेषतः जब मातृकुल में श्राद्ध करने वाला कोई न हो या मृत्यु-तिथि ज्ञात न हो। निर्णय सिन्धु और धर्म सिन्धु में इस तिथि के लिए विशिष्ट विधान वर्णित हैं। प्रयाग पंडित्स के विद्वान आचार्य संगम तट पर शास्त्रोक्त रीति से प्रतिपदा श्राद्ध सम्पन्न कराते हैं।
प्रतिपदा श्राद्ध क्या है
हिन्दू पञ्चाङ्ग में पक्ष की प्रथम तिथि को प्रतिपदा कहा जाता है। पितृ पक्ष आरम्भ होते ही भाद्रपद कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि आती है, जिसे महालय का प्रथम दिन माना गया है। इस तिथि पर प्रतिपदा को दिवंगत पितरों का तिथि-श्राद्ध किया जाता है। नाना-नानी के लिए इस दिन श्राद्ध करने की परम्परा भी मिलती है। इसके अतिरिक्त आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नाना (मातामह) के श्राद्ध हेतु समर्पित माना गया है, जिसे दौहित्र प्रतिपदा भी कहते हैं।
प्रतिपदा-तिथि-मृत पूर्वजों के लिए विशेष महत्व
श्राद्ध-कर्म का मूल सिद्धान्त यही है कि जिस तिथि को पितर का देहावसान हुआ हो, उसी तिथि को पितृ पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाए। प्रतिपदा को मृत्यु प्राप्त पितर के निमित्त परिजन वर्ष-वर्ष पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ही अन्न, जल और पिण्ड का अर्पण करते हैं। यह तिथि-श्राद्ध पितरों को सीधा तृप्ति प्रदान करता है तथा कुल पर पितृ-कृपा बनी रहती है।
शुक्ल प्रतिपदा बनाम कृष्ण प्रतिपदा का अंतर
कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा और पितृ पक्ष के बाद की शुक्ल प्रतिपदा अलग तिथियाँ हैं। इनके विशेष विधान अपने आचार्य से स्पष्ट करें —
- कृष्ण प्रतिपदा (पितृ पक्ष का प्रथम दिन): महालय श्राद्ध की पहली तिथि। यह प्रतिपदा-तिथि-मृत पूर्वजों के तिथि-श्राद्ध और परम्परानुसार नाना-नानी के श्राद्ध के लिए ग्रहण की जाती है। सकृन्महालय (एक दिन में सम्पूर्ण पितृ पक्ष का श्राद्ध) के लिए शास्त्र इसे वर्जित मानते हैं क्योंकि यह नन्दा तिथि है।
- शुक्ल प्रतिपदा (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा): पितृ पक्ष समाप्त होने के तुरंत बाद आने वाली यह तिथि नाना (मातामह) के श्राद्ध को समर्पित है। इसे दौहित्र प्रतिपदा भी कहा जाता है।
निर्णय सिन्धु और धर्म सिन्धु में प्रतिपदा का विधान
निर्णय सिन्धु में उल्लिखित है कि सकृन्महालय के लिए नन्दा तिथियाँ — प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी — सामान्य रूप से वर्जित हैं। किन्तु एक विशेष अपवाद भी दिया गया है — यदि किसी पितर की वास्तविक मृत्यु तिथि प्रतिपदा ही हो, तो उस दिन उनका तिथि-श्राद्ध करने पर नन्दा तिथि का यह निषेध लागू नहीं होता। इसलिए प्रतिपदा-तिथि-मृत पूर्वज का श्राद्ध प्रतिपदा को ही करना अनिवार्य माना गया है। धर्म सिन्धु में भी इसी विधान की पुष्टि की गई है।
दौहित्र प्रतिपदा — नाना का विशेष श्राद्ध
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को धर्म सिन्धु एवं हेमाद्रि के सन्दर्भ में नाना (मातामह) के पार्वण श्राद्ध का विधान है। इस दिन के सम्बन्ध में निर्णय सिन्धु स्पष्ट करता है —
- मामा जीवित होने पर भी दौहित्र (नाती) को नाना का यह श्राद्ध करना चाहिए।
- नानी जीवित हों तो केवल नाना का पार्वण; दोनों का देहान्त हो चुका हो तो सपत्नीक श्राद्ध।
- पिता के जीवित होते हुए भी दौहित्र को इस श्राद्ध का अधिकार है।
- नवजात अथवा अनुपनीत (जिनका जनेऊ संस्कार न हुआ हो) दौहित्र भी अधिकारी हैं।
- पिण्डदान सपिण्डक या अपिण्डक (केवल संकल्प + ब्राह्मण भोजन-दान) दोनों रूपों में मान्य।
प्रतिपदा श्राद्ध की विधि — चरण दर चरण
शास्त्रोक्त प्रतिपदा श्राद्ध पार्वण विधि से सम्पन्न किया जाता है। प्रयाग पंडित्स द्वारा अनुसरित पारम्परिक क्रम इस प्रकार है —
- स्नान एवं संकल्प: गंगा-स्नान के पश्चात् यजमान कुश-तिल-जल लेकर प्रतिपदा-तिथि-मृत पितर के निमित्त संकल्प करते हैं।
- तर्पण: देव, ऋषि एवं पितृ-तीनों के निमित्त जल-तर्पण। प्रतिपदा-मृत पूर्वज का नाम-गोत्र सहित विशिष्ट तर्पण।
- विश्वेदेव-स्थापन: मातामह श्राद्ध में ‘धूरिलोचन’ अथवा मतान्तर से ‘पुरूरवा-आर्द्रव’ विश्वेदेवों का आवाहन।
- पिण्डदान: चावल, जौ, तिल मिश्रित पिण्डों का अर्पण; मन्त्र सहित पिण्ड का स्पर्श कराकर अर्पण।
- ब्राह्मण भोजन: शास्त्रसम्मत ब्राह्मण को आसन, भोजन, दक्षिणा एवं तिल-जल का दान।
- विसर्जन एवं आशीर्वाद: पिण्डों का गाय अथवा गंगा को अर्पण; विश्वेदेव-पितृ विसर्जन; ब्राह्मण आशीर्वाद ग्रहण।
प्रतिपदा श्राद्ध का काल — अपराह्न-व्यापिनी तिथि
श्राद्ध-कर्म के लिए शास्त्र अपराह्न-काल (दोपहर के बाद का समय) ग्रहण करते हैं क्योंकि यही पितरों का प्रिय काल है। प्रतिपदा तिथि भी वही ली जाती है जो अपराह्न-व्यापिनी हो — अर्थात् जिस दिन प्रतिपदा अपराह्न-काल में विद्यमान हो। यदि एक ही दिन प्रतिपदा अपराह्न में हो और अगले दिन भी, तो जिस दिन अपराह्न में अधिक काल व्याप्त हो, उसी को ग्रहण करना चाहिए।
श्राद्ध की सामग्री
- कुश, काले तिल, जौ, अक्षत (बिना टूटा चावल), यव
- गंगाजल अथवा शुद्ध जल, तीर्थ-जल
- दूध, दही, घी, मधु, गुड़ — पञ्चामृत
- पिण्डदान हेतु पकाया हुआ चावल, जौ का आटा
- श्राद्ध-भोजन — खीर, पूड़ी, सब्ज़ी, पकवान (पितरों का प्रिय)
- दर्भ-पवित्री, यज्ञोपवीत, चन्दन, पुष्प, धूप-दीप
- ब्राह्मण-दक्षिणा एवं वस्त्र
प्रतिपदा श्राद्ध हेतु उपयुक्त तीर्थ
शास्त्रों में पितृ-कर्म हेतु तीन क्षेत्र विशेष कहे गए हैं — प्रयागराज (त्रिवेणी संगम), गया (विष्णुपद) और काशी (मणिकर्णिका)। संगम तट पर पितरों के निमित्त श्राद्ध को विशेष पुण्यदायी माना जाता है। प्रयाग में अक्षयवट, संगम तट और दशाश्वमेध घाट प्रमुख स्थल हैं जहाँ शास्त्रोक्त रीति से यह कर्म सम्पन्न किया जाता है।
क्या प्रतिपदा का श्राद्ध सर्व पितृ अमावस्या पर किया जा सकता है
यदि किसी कारणवश प्रतिपदा तिथि को श्राद्ध सम्भव न हो — जैसे प्रवास, अस्वस्थता, अथवा सूतक — तो शास्त्र वैकल्पिक उपाय भी देते हैं। ऐसी स्थिति में सर्व पितृ अमावस्या (महालय अमावस्या) के दिन समस्त पितरों का सम्मिलित श्राद्ध करते हुए प्रतिपदा-तिथि-मृत पूर्वज का भी संकल्प सहित स्मरण किया जा सकता है। तथापि सामर्थ्य होने पर तिथि-विशेष श्राद्ध ही श्रेष्ठ माना गया है।
प्रयाग पंडित्स द्वारा प्रतिपदा श्राद्ध सेवा
प्रयाग पंडित्स के अनुभवी आचार्य संगम तट पर शास्त्रोक्त रीति से प्रतिपदा श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान सम्पन्न कराते हैं। प्रत्येक यजमान के गोत्र, तिथि एवं संकल्प के अनुसार पूजा सामग्री व्यवस्थित की जाती है। हमारे पुरोहित निर्णय सिन्धु एवं धर्म सिन्धु के विधानों का पालन करते हुए पिण्डदान विधि का पालन कराते हैं तथा पिण्डदान का सम्पूर्ण ज्ञान सहज भाषा में आपको देते हैं। बुकिंग के लिए सम्पर्क करें — +91 77540 97777।
श्राद्ध-कर्म से जुड़ी अन्य आवश्यक जानकारी हेतु — मृत्यु के बाद ब्राह्मण भोज लेख देखें। संगम तट पर श्राद्ध एवं अन्तिम संस्कार सेवा हेतु हम अस्थि विसर्जन प्रयागराज तथा प्रयागराज पिण्डदान पैकेज भी उपलब्ध कराते हैं। आपातकालीन सेवा एवं पञ्चाङ्ग-शुद्ध मुहूर्त निर्धारण के लिए हमारे आचार्यों से सम्पर्क करें।
निष्कर्ष
प्रतिपदा श्राद्ध केवल तिथि-विशेष कर्म नहीं — यह उन पितरों के प्रति विशिष्ट कृतज्ञता है जिनकी मृत्यु प्रतिपदा को हुई। निर्णय सिन्धु एवं धर्म सिन्धु के विधानों का पालन करते हुए सही तिथि, सही काल, सही विधि एवं सही स्थान पर किया गया श्राद्ध पितरों को परम तृप्ति प्रदान करता है। प्रयाग पंडित्स आपके इस सनातन दायित्व को शास्त्रोक्त रीति से पूर्ण कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
प्रतिपदा श्राद्ध 2026 — तिथि और प्रयागराज के मुहूर्त
वर्ष 2026 में प्रतिपदा श्राद्ध रविवार, 27 सितंबर को है। इससे पहले 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है। प्रतिपदा को पड़वा श्राद्ध भी कहते हैं।
- कुतुप मुहूर्त: प्रातः 11:29 से दोपहर 12:17 बजे।
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:17 से 1:06 बजे।
- अपराह्न काल: दोपहर 1:06 से 3:30 बजे।
ये समय प्रयागराज के स्थानीय समय (IST) में हैं। प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर रात 10:18 बजे से 27 सितंबर रात 8:58 बजे तक है। प्रयागराज का प्रतिपदा श्राद्ध पंचांग देखें और अपनी कुल-परम्परा के अनुसार अंतिम समय आचार्य से निश्चित करें। स्नान और तैयारी के लिए घाट पर प्रातः 10 बजे से पहले पहुँचना उपयोगी है।
नाना-नानी के श्राद्ध का विकल्प और सही संकल्प
दृक् पंचांग के अनुसार, मातृकुल में श्राद्ध करने वाला कोई न हो अथवा नाना-नानी की मृत्यु-तिथि ज्ञात न हो, तो पितृ पक्ष की प्रतिपदा को भी उनके निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है। यह पितृ पक्ष के बाद आने वाली दौहित्र प्रतिपदा से अलग तिथि है। परिवार का कर्ता कौन होगा तथा कौन-सा विधान लागू होगा, यह आचार्य से तय करें।
मातृकुल के पूर्वजों का आवाहन करते समय उनके नाम और मातृकुल का गोत्र स्पष्ट रखें। नाना, नानी और उनसे पूर्व के दिवंगत मातृ-पूर्वजों को स्मरण करें। पिंडों की संख्या, मंत्र और तर्पण की मुद्रा अपने आचार्य के निर्देशन में रखें; केवल मातृकुल होने के कारण अलग हाथ का नियम मानकर स्वयं विधि न बदलें।
यदि परिवार में पिछले वर्ष ही किसी का निधन हुआ है, तो प्रथम वार्षिक श्राद्ध, सपिण्डीकरण और पितृ पक्ष के अनुष्ठान में कौन-सा क्रम लागू है, यह व्यक्तिगत परिस्थिति के अनुसार आचार्य से समझें।
प्रतिपदा श्राद्ध की तैयारी और आचरण
प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें, स्वच्छ श्वेत या हल्के वस्त्र पहनें और रसोई स्वच्छ रखें। चावल, जौ, तिल, घी, दूध, मधु और ऋतु-फल जैसे सात्त्विक पदार्थ तैयार रखें। कुशा को आसन के रूप में और परम्परानुसार ताँबे के पात्र का उपयोग किया जाता है।
पितरों के प्रिय सात्त्विक व्यंजन, जैसे खीर, स्मरणपूर्वक अर्पित किए जा सकते हैं। सफेद फूल, चमेली या मोगरा और दीप भी परम्परानुसार रखे जाते हैं। नाना-नानी का नाम लेकर स्मरण करें; उनके सम्मान में दीप और भोजन-दान की व्यवस्था अपने आचार्य से समझें। ब्राह्मण परिवार की महिला को भोजन-दान देकर नानी का स्मरण करने जैसी प्रथाएँ कुलाचार के अनुसार अपनाएँ।
ब्राह्मण भोजन के बाद और परिवार के भोजन से पहले गाय, कौए तथा कुत्ते के लिए अन्न का अंश निकालने की परम्परा है। कौए को पितरों का संदेशवाहक माना जाता है।
- मातृकुल और पितृकुल के संकल्प तथा नाम-गोत्र स्पष्ट रखें; मंत्र और मुद्रा में आचार्य का मार्गदर्शन लें।
- परम्परानुसार ताँबा, मिट्टी या पत्तल का उपयोग करें; अनुष्ठान के लिए लोहे या स्टील का पात्र चुनने से पहले आचार्य से पूछें।
- श्राद्ध के लिए निर्धारित दिन का मुहूर्त रखें और सूर्यास्त के बाद अनुष्ठान करने से बचें।
- इस दिन नया व्यापार, विवाह या सगाई जैसे शुभारम्भ स्थगित रखने की परम्परा है।
- ब्राह्मण भोजन और जीवों के लिए अन्न निकालने से पहले स्वयं भोजन न करें।
प्रयागराज में प्रतिपदा श्राद्ध की बुकिंग
पहली बार श्राद्ध करने वाले, पारिवारिक परम्परा निभाने वाले और विदेश में रहने वाले परिवार प्रयाग पंडित्स से विधि और संकल्प का मार्गदर्शन ले सकते हैं। त्रिवेणी संगम पर अनुष्ठान और यात्रा न कर पाने पर प्रतिनिधि-श्राद्ध या उपलब्ध वीडियो-कॉल विकल्पों की पुष्टि बुकिंग के समय करें।
प्रयागराज में श्राद्ध — ₹7,100 से शुरू। अनुभवी वैदिक पंडित, संगम पर अनुष्ठान और सामग्री का विवरण चुने हुए पैकेज में देखें। संपर्क करें या +91 77540 97777 पर कॉल करें।
पूरे क्रम के लिए पितृ पक्ष की सम्पूर्ण मार्गदर्शिका, पूर्णिमा श्राद्ध और द्वितीया श्राद्ध पढ़ें। गया पिंड दान का महत्त्व तथा पितृ ऋण के बारे में भी जानें।
अन्य विकल्प: गया में पितृ पक्ष पिंड दान और प्रयागराज में तर्पण। वर्तमान शुल्क और समावेश संबंधित सेवा-पृष्ठ पर देखें।
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भारत के पवित्र स्थलों पर वेद-प्रशिक्षित पंडितों द्वारा प्रामाणिक संस्कार कराए जाते हैं।



