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दशगात्र में 10 पिंड आत्मा का शरीर कैसे बनाते हैं?

उत्तर दिया Prakhar Porwal ·

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद शोक के पहले दस दिनों में प्रतिदिन ठीक एक पिंड अर्पित किया जाता है, जिससे आत्मा का नया सूक्ष्म शरीर (आतिवाहिक शरीर) क्रमशः अंग-अंग बनता है। जब व्यक्ति की मृत्यु होती है, आत्मा स्थूल शरीर छोड़कर तुरंत अंगूठे के आकार की निराकार अवस्था धारण करती है। परलोक की ओर यम्य मार्ग पर यात्रा करने के लिए आत्मा को इस नए सूक्ष्म शरीर की आवश्यकता होती है। पिंड केवल प्रतीकात्मक भोजन नहीं हैं — वे इस नए शरीर के वास्तविक निर्माण-खंड माने गए हैं। इनके बिना आत्मा वायुमंडल में दुखी प्रेत की तरह अटकी रहती है। क्रम सख्ती से निर्धारित है:

  • Day 1: सिर बनाता है (Shirah-puraka)
  • Day 2: कान, आँखें और नाक बनाता है (Karnakshinasika-puraka)
  • Day 3: गर्दन, कंधे, भुजाएँ और छाती बनाता है (Galamamsabhujavakshah-puraka)
  • Day 4: नाभि, जननांग और मलोत्सर्ग अंग बनाता है (Nabhilingaguda-puraka)
  • Day 5: घुटने, पिंडलियाँ और पैर बनाता है (Janujanghapada-puraka)
  • Day 6: सभी मर्मस्थल और जोड़ बनाता है (Sarvamarma-puraka)
  • Day 7: सभी नसें और नाड़ियाँ बनाता है (Sarvanadi-puraka)
  • Day 8: दाँत और शरीर के रोम बनाता है (Dantaloma-puraka)
  • Day 9: जीवन-रस बनाता है (Viryarajah-puraka)
  • Day 10: पूर्णता देता है, शरीर को तृप्त करता है, और भूख-प्यास से राहत देता है (Purnatatriptatakshudhiparyaya-puraka)

इसीलिए 10-दिन की पिंड दान विधि को दशगात्र कहा जाता है — दश का अर्थ दस, और गात्र का अर्थ शरीर के अंग है।

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